नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी।
सुप्रीम कोर्ट में सीईसी विरोध प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर हिरासत का मुद्दा
नई दिल्ली। सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या राज्य ने बिना घोषणा किए इमरजेंसी जैसी स्थिति थोप दी है। यह टिप्पणी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के बीच आई।
मेनका गुरुस्वामी ने जस्टिस जॉयमालय बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के सामने अपनी हेबियस कॉर्पस याचिका पर दलील दी। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 358 के मुताबिक अनुच्छेद 19 के अधिकारों पर रोक तभी लग सकती है जब इमरजेंसी लागू हो। क्या सरकार यह कह रही है कि उसने बिना घोषित किए इमरजेंसी लगा दी है?
उन्होंने अदालत को एडीएम जबलपुर फैसले की याद दिलाई। यह फैसला 1975 की इमरजेंसी के दौरान आया था। उस समय हेबियस कॉर्पस जैसी रिट को भी निलंबित कर दिया गया था। मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि पिछली बार अदालत को ऐसी चुनौती इमरजेंसी के दौरान मिली थी। अब लगभग 50 साल बाद फिर वही स्थिति सामने आई है।
प्रदर्शन के दौरान हिरासत और पाबंदियां
यह याचिका दिल्ली पुलिस द्वारा राजनीतिक नेताओं और अन्य लोगों की हिरासत के खिलाफ दायर की गई थी। विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि चुनाव प्रणाली निष्पक्ष नहीं है।
मेनका गुरुस्वामी ने बताया कि रिपोर्ट्स के मुताबिक राजधानी में करीब 45 डिटेंशन सेंटर बनाए गए। कम से कम तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके घरों से उठाया गया। कई सांसदों को घरों में ही रोक दिया गया। उन्होंने कहा कि युवा शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने निकले थे।
याचिका में इंटरनेट बंद होने और मेट्रो-रेल सेवाओं पर असर का जिक्र भी था। मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जब उन्होंने याचिका दाखिल की तब हिरासत के पैमाने का अंदाजा नहीं था क्योंकि इंटरनेट काम नहीं कर रहा था। हेबियस कॉर्पस ऐसे मामलों में क्लासिक राहत है।
अदालत ने इस सुनवाई को असाधारण बताया। याचिका के साथ अवमानना याचिका भी चली। उसमें आरोप था कि अदालत के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन हुआ। उस आदेश में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूरी पाबंदी न लगाने को कहा गया था।
अदालत के निर्देश
बेंच ने नोटिस जारी किया। अदालत ने साफ कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में न लिया जाए। खासकर उन क्षेत्रों में जहां धारा 163 बीएनएसएस के तहत पाबंदी लागू नहीं है। मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से चलें। आवागमन पर अनावश्यक रोक न लगे। ये निर्देश कानून-व्यवस्था की स्थिति के अधीन हैं।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास लगाई गई पाबंदी के नोटिस बोर्ड हटाने को भी कहा। वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को बिना रुकावट आने-जाने दिया जाए।
एडीएम जबलपुर का संदर्भ क्यों
एडीएम जबलपुर मामले में 1975 की इमरजेंसी के दौरान बहुमत फैसला आया था। उसमें कहा गया कि इमरजेंसी में मौलिक अधिकार लागू कराने के लिए अदालत नहीं जा सकते। जस्टिस एचआर खन्ना का असहमति वाला फैसला अलग था। उन्होंने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार कानून के बिना नहीं छीना जा सकता। बाद में 44वें संशोधन से अनुच्छेद 20 और 21 को इमरजेंसी में भी सुरक्षित किया गया।
मेनका गुरुस्वामी ने इसी इतिहास की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को निलंबित करने जैसा मामला गंभीर है। अदालत आज इसलिए बैठी है क्योंकि दांव पर यही अधिकार हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य संगठनों के आह्वान पर हुआ। विपक्षी नेताओं समेत कई लोग हिरासत में लिए गए। पूर्व मुख्यमंत्रियों में अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनाराई विजयन और माणिक सरकार का नाम याचिका में था। कई नेताओं को घर से उठाया गया। प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया।
पुलिस और प्रशासन की तरफ से तर्क दिया गया कि कुछ मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश-निकास सीमित किया गया। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए गए। अदालत ने दोनों पक्षों की बात सुनी और अंतरिम निर्देश दिए।







