अफगान में तालिबान सरकार का नया फरमान: पत्नियों को पीट सकते है, बशर्ते हड्डी न टूटी हो
विदेश डेस्क, नीतीश कुमार।
अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने एक नया आपराधिक कानून लागू किया है, जिसे लेकर मानवाधिकार संगठनों में गंभीर चिंता जताई जा रही है। इस नए कानून पर तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। माना जा रहा है कि इसके लागू होने से महिलाओं की स्थिति और अधिक कठिन हो जाएगी।
करीब 90 पन्नों के इस क्रिमिनल कोड में इस्लामी धार्मिक ग्रंथों की पुरानी व्याख्याओं को शामिल किया गया है। इसके तहत ऊंचे पदों पर बैठे धार्मिक नेताओं को आपराधिक मामलों में लगभग संरक्षण मिल जाता है, जबकि मजदूर और आम वर्ग के लोगों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।
इस कानून का सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि इसमें महिलाओं को लगभग दास के समान दर्जा दिया गया है। प्रावधानों के अनुसार, पति या मालिक को अपनी पत्नी को “विवेकाधीन सजा” के रूप में मारपीट करने की अनुमति दी गई है।
नया कानून समाज को सख्त वर्गों में बांटता है, जहां धार्मिक विद्वान कानूनी जांच से ऊपर माने गए हैं। इसके साथ ही पतियों और पिताओं को तय सीमाओं के भीतर महिलाओं और बच्चों को शारीरिक दंड देने का अधिकार दिया गया है।
कानून में यह भी कहा गया है कि यदि कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना रिश्तेदारों से मिलने जाती है, तो उसे तीन महीने तक की जेल हो सकती है। इसके अलावा, ‘गुलामी’ से जुड़े रिवाजों को भी कानूनी मान्यता दी गई है।
कानूनी भाषा में यह स्पष्ट किया गया है कि शारीरिक सजा इस शर्त पर दी जा सकती है कि न तो हड्डी टूटे और न ही त्वचा कटे। गंभीर अपराधों में सुधार सेवाओं की जगह धार्मिक मौलवी सजा देंगे, जबकि कम गंभीर मामलों में पति अपनी पत्नी को पीटकर दंड दे सकता है।
हालांकि कानून महिलाओं को हमले की स्थिति में न्याय का रास्ता दिखाता है, लेकिन इसके लिए महिला को अदालत में अपने घाव दिखाकर यह साबित करना होगा कि उसे गंभीर शारीरिक नुकसान हुआ है। साथ ही, उसे पूरी तरह ढका हुआ होना अनिवार्य है।
इतना सब साबित कर देने के बाद भी, यदि यह तय हो जाता है कि पति ने गंभीर हमला किया है, तो भी उसके लिए अधिकतम सजा केवल 15 दिन की जेल रखी गई है।







