लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य के जीवन में आत्मविश्वास एक ऐसी शक्ति है, जो कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देती है। वहीं आत्ममुग्धता ऐसी प्रवृत्ति है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को दूसरों से बेहतर समझने लगता है। दोनों के बीच अंतर बहुत सूक्ष्म है, लेकिन जीवन पर उनका प्रभाव बिल्कुल अलग होता है।
उक्त विचार लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई ( जोन 41 26-27 ) के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
आत्मविश्वास व्यक्ति को अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना सिखाता है। आत्मविश्वासी व्यक्ति अपनी खूबियों को पहचानता है, लेकिन अपनी कमियों को स्वीकार करने से भी नहीं डरता। वह सफलता मिलने पर विनम्र रहता है और असफलता से सीख लेकर आगे बढ़ता है। उसे यह विश्वास होता है कि मेहनत, धैर्य और निरंतर प्रयास से वह अपनी मंजिल हासिल कर सकता है।
इसके विपरीत आत्ममुग्धता व्यक्ति को अपनी प्रशंसा में इतना डुबो देती है कि उसे दूसरों की अच्छाइयाँ दिखाई देना कम हो जाती हैं। आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर देख सकता है, आलोचना सुनना पसंद नहीं करता और अक्सर दूसरों की राय को महत्व नहीं देता। यही प्रवृत्ति धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी और व्यवहार में अहंकार पैदा कर सकती है।
वास्तव में आत्मविश्वास कहता है—“मैं कर सकता हूँ।”
जबकि आत्ममुग्धता कहती है—“मुझसे बेहतर कोई नहीं।”
इन दोनों वाक्यों का अंतर ही व्यक्तित्व की दिशा तय करता है। आत्मविश्वास हमें दूसरों का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना सिखाता है, जबकि आत्ममुग्धता हमें दूसरों से ऊपर साबित करने की मानसिकता की ओर ले जाती है।
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना गलत नहीं है। लेकिन गर्व और घमंड के बीच की सीमा को समझना आवश्यक है। जिस दिन व्यक्ति अपनी सफलता को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण मानने लगे और दूसरों को छोटा समझने लगे, उसी दिन आत्मविश्वास धीरे-धीरे आत्ममुग्धता में बदलने लगता है।
सच्चा आत्मविश्वास वही है, जिसमें सफलता के साथ विनम्रता, ज्ञान के साथ जिज्ञासा और सामर्थ्य के साथ संवेदनशीलता बनी रहे। जो व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का प्रयास करता है, वही वास्तव में मजबूत व्यक्तित्व का परिचय देता है।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास जरूरी है, लेकिन उसे विनम्रता की लगाम से बाँधकर रखना उससे भी अधिक जरूरी है। क्योंकि आत्मविश्वास व्यक्ति को ऊँचाई तक पहुँचाता है, जबकि आत्ममुग्धता उसी ऊँचाई से गिरने का कारण बन सकती है।
इसलिए स्वयं पर विश्वास रखिए, अपनी उपलब्धियों का सम्मान कीजिए, लेकिन दूसरों के सम्मान को कभी कम मत होने दीजिए। क्योंकि सच्ची महानता इस बात में नहीं कि हम स्वयं को कितना बड़ा समझते हैं, बल्कि इस बात में है कि हमारी सफलता के बावजूद दूसरे लोग हमें कितना विनम्र और सहज पाते हैं।






