लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य के स्वरूप का वास्तविक चित्र उसके हृदय से मिलता है,बाहरी व्यवहार से नहीं और हृदय का पता दूसरों को लगता नहीं।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।मैं कैसा हूं,क्या हूं,इसे मैं ही जान सकता हूं ।
एक आदमी बाहर से बहुत सज्जन और भला आदमी मालूम होता है,वह अंदर से बड़ा दंभी और पापी हो सकता है और एक आदमी जो बाहर से साधारण दीखता है,वास्तव में बड़ा महात्मा हो सकता है।मनुष्यों में परस्पर मित्रता का जैसा प्रेम होना चाहिए,जिसकी कुछ कल्पना तो मन में आती है,पर सचमुच अपने अंदर वैसा मैत्री-प्रेम भी मैं किसी के प्रति नहीं पाता।मनुष्य को बड़ा मीठा लगता है अपना सम्मान। यद्यपि नाम-रूप के सम्मान,पूजन या यश-कीर्ति का कुछ भी यथार्थ महत्व नहीं है; क्योंकि नाम की कल्पना जन्म के बाद होती है और वह बदलने वाला तथा मिटने वाला होता है;एवं रूप तो जन्म से मृत्यु तक ही रहता है,परन्तु मनुष्य मोहवश मारने के बाद भी शरीर के नामरूप की पूजार्चना,यश-कीर्ति और मान-सम्मान की चाह करता है और इसके लिए जीवनकाल में नाना प्रकार के स्वांग रच कर सदा अपने-आपको ही धोखा देता रहता है।पुरुष श्रद्धामय है,असल में श्रद्धा के अनुसार ही मनुष्य के विचार होते हैं और विचारों के अनुसार ही उसका स्वरूप होता है।मनुष्य के विचार उसके इतने समीप हैं,जितने समीप उसके हाथ-पैर और आँख-कान आदि अंग भी नहीं हैं।मन के विचारों का आत्मा के साथ साक्षात् संबंध है,जबकि कर-चरणादि तथा नेत्र-श्रोत्रादि तो मन के सेवकमात्र हैं।







