विदेश डेस्क, ऋषि राज
तेल अवीव/बेरूत: पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव और सैन्य टकराव के बीच शुक्रवार तड़के इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिनों के लिए युद्धविराम लागू हो गया। यह संघर्षविराम पूर्व निर्धारित समयानुसार 16 अप्रैल शाम पांच बजे (स्थानीय समय) तथा भारतीय समयानुसार 17 अप्रैल तड़के 3:30 बजे से प्रभावी माना गया। इस युद्धविराम से क्षेत्र में शांति और स्थिरता की नई उम्मीद जगी है।
पिछले कई सप्ताहों से इजरायल और लेबनान सीमा पर लगातार गोलाबारी, हवाई हमले और सैन्य तनाव देखने को मिल रहा था। दोनों देशों के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी थी। खासतौर पर लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह और इजरायली सेना के बीच लगातार हो रही झड़पों ने हालात को गंभीर बना दिया था। ऐसे समय में 10 दिन के युद्धविराम पर सहमति को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस समझौते का स्वागत किया। उन्होंने कहा, “लेबनान के लिए यह एक ऐतिहासिक दिन हो सकता है। अच्छी चीजें हो रही हैं।” ट्रंप के बयान के बाद यह संकेत भी मिले हैं कि अमेरिका ने दोनों पक्षों के बीच तनाव कम कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह युद्धविराम केवल अस्थायी राहत नहीं, बल्कि व्यापक शांति वार्ता की दिशा में पहला कदम साबित हो सकता है। यदि दोनों पक्ष संघर्षविराम का पालन करते हैं, तो भविष्य में स्थायी समाधान की संभावना भी मजबूत होगी। हालांकि, क्षेत्रीय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सीमा पर किसी भी छोटी घटना से स्थिति दोबारा बिगड़ सकती है।
लेबनान के कई हिस्सों में लोग इस फैसले से राहत महसूस कर रहे हैं। लगातार हमलों और भय के माहौल के बीच आम नागरिकों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में सामान्य जीवन फिर पटरी पर लौट सकेगा। वहीं इजरायल की ओर से भी सीमा क्षेत्रों में सतर्कता बरकरार रखी गई है।
संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय देशों ने इस युद्धविराम का स्वागत किया है तथा दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकाला जाना चाहिए।
अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अगले 10 दिनों में हालात किस दिशा में बढ़ते हैं। यदि शांति कायम रहती है, तो यह पूरे पश्चिम एशिया के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है।







