बिजनेस डेस्क, मुस्कान कुमारी।
मुंबई। भारत को पूंजी की लागत घटाने और बैंकों से आगे वित्तपोषण के स्रोतों को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाने चाहिए, जिसमें ऋण उपकरणों पर कर में कमी शामिल है, सरकारी वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण ने सुझाव दिया है। यह सिफारिशें बजट से ठीक पहले आई हैं, जहां कर बदलावों की घोषणा होती है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि निरंतर विकास के वित्तपोषण के लिए भारत को दीर्घकालिक पूंजी बाजारों को मजबूत करना चाहिए। इसके लिए ऋण उपकरणों के कर उपचार को तर्कसंगत बनाने समेत एक समन्वित एजेंडा अपनाया जाए। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा तैयार इस सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि मौजूदा कर व्यवस्था निवेशकों को इक्विटी की ओर झुकाती है, जिससे ऋण उपकरणों की तरलता प्रभावित होती है।
बाजार में इक्विटी का दबदबा, ऋण की अनदेखी
वर्तमान में भारत में ऋण उपकरणों पर निवेशक की लागू कर स्लैब के अनुसार कर लगता है, जबकि इक्विटी उपकरणों पर एक साल से कम अवधि के लिए 20 प्रतिशत की सपाट दर और लंबी अवधि के लिए 12.5 प्रतिशत कर है। व्यक्तिगत आयकर दरें 40 प्रतिशत तक जा सकती हैं। इस असमानता से निवेशक इक्विटी की ओर आकर्षित होते हैं, जो ऋण बाजार की तरलता को नुकसान पहुंचाती है।
सर्वेक्षण ने कम रेटिंग वाले उधारकर्ताओं के लिए क्रेडिट एन्हांसमेंट सुविधाएं बनाने का भी सुझाव दिया है, ताकि वे कम लागत पर धन जुटा सकें। साथ ही, दीर्घकालिक फंडों के निवेश दिशानिर्देशों की समीक्षा की बात कही गई है। इन सुधारों से बुनियादी ढांचे और जलवायु वित्तपोषण के लिए आवश्यक पैमाने और परिपक्वता मिलेगी, साथ ही अर्थव्यवस्था की पूंजी लागत कम होगी।
गतिविधि आधारित नियमन की मांग
सर्वेक्षण ने अलग से वित्तीय नियमन में समन्वय की अपील की है, जहां वर्तमान में डोमेन-विशिष्ट नियामक काम करते हैं। नियामकीय मध्यस्थता से बचने के लिए, नियमन को इकाई-आधारित से गतिविधि-आधारित ढांचे में बदलना चाहिए। नियामकीय मध्यस्थता का मतलब है कि फर्म आसान नियमों के फायदे के लिए खामियों का इस्तेमाल करती हैं।
यह सुझाव ऐसे समय में आया है जब भारत की अर्थव्यवस्था तेज विकास की राह पर है, लेकिन पूंजी बाजारों में असंतुलन बाधा बन रहा है। सर्वेक्षण के मुताबिक, इन बदलावों से लंबी अवधि की परियोजनाओं को मजबूत समर्थन मिलेगा, जो देश के बुनियादी ढांचे और पर्यावरण लक्ष्यों के लिए जरूरी है।
कर असमानता का प्रभाव
ऋण उपकरणों पर ऊंचा कर निवेशकों को हतोत्साहित करता है, जबकि इक्विटी पर कम दरें बाजार को जीवंत रखती हैं। सर्वेक्षण ने स्पष्ट किया कि इस असंतुलन को दूर करने से कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार गहरा होगा, जो कंपनियों को सस्ता फंड उपलब्ध कराएगा। साथ ही, कम रेटिंग वाली कंपनियों के लिए क्रेडिट सुविधाएं बाजार की पहुंच बढ़ाएंगी।
दीर्घकालिक फंडों जैसे पेंशन और बीमा कोशों के निवेश नियमों में बदलाव से मध्यम रेटिंग वाले सिक्योरिटीज में निवेश बढ़ेगा। इससे बाजार में विविधता आएगी और जोखिम कम होगा।
नियामकीय सुधारों की जरूरत
वित्तीय बाजारों में समन्वय की कमी से कई चुनौतियां हैं। सर्वेक्षण ने सुझाव दिया कि एकीकृत नियमन से मध्यस्थता रुकेगी और बाजार अधिक पारदर्शी बनेगा। यह बदलाव दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर जब भारत जलवायु परिवर्तन और बुनियादी ढांचे पर बड़े निवेश की योजना बना रहा है।
इन सिफारिशों का असर बजट में दिख सकता है, हालांकि सरकार इन पर बाध्य नहीं है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार देंगे।







