Ad Image
Ad Image
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा हेट स्पीच मामले की आज सुनवाई की || लोकसभा से निलंबित सांसदों पर आसन पर कागज फेंकने का आरोप || लोकसभा से कांग्रेस के 7 और माकपा का 1 सांसद निलंबित || पटना: NEET की छात्रा के रेप और हत्या को लेकर सरकार पर जमकर बरसे तेजस्वी || स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, केशव मौर्य को होना चाहिए यूपी का CM || मतदाता दिवस विशेष: मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा 'मतदान राष्ट्रसेवा' || नितिन नबीन बनें भाजपा के पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ. लक्ष्मण ने की घोषणा || दिल्ली को मिली फिर साफ हवा, AQI 220 पर पहुंचा || PM मोदी ने भारतरत्न अटल जी और मालवीय जी की जयंती पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया || युग पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्म जयंती आज

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

छठ महापर्व का दूसरा दिन ‘खरना’

नेशनल डेस्क, नीतीश कुमार। 

छठ महापर्व बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड सहित पूरे देश में आस्था और लोक परंपरा का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें दूसरे दिन का विशेष नाम है ‘खरना’। खरना व्रतियों के लिए न केवल कठिन तपस्या का आरंभ है, बल्कि शुद्धता, संयम और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है।

क्या होता है ‘खरना’?

छठ महापर्व के दूसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जला (बिना पानी) उपवास रखते हैं। सूर्यास्त के बाद स्नान-ध्यान कर, व्रती मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़ की खीर और गेहूं की रोटी (या पूरी) बनाते हैं। इस प्रसाद को पूरे पवित्र भाव से सबसे पहले सूर्य देवता और छठी मैया को अर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रती इस भोग को स्वयं ग्रहण करते हैं और फिर परिवार तथा समाज में भी बांटते हैं.

धार्मिक और सामाजिक महत्व

खरना से शुरू होता है 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास, जिसमें व्रती अगले दिन उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देने तक कुछ खाते-पीते नहीं। यह व्रत संतान सुख, परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और समाज की समृद्धि के लिए किया जाता है। मान्यता है कि खरना के बाद छठी मैया का घर में आगमन होता है, और उनकी कृपा से हर मनोकामना पूरी होती है। 

परंपरा और शुद्धता का समावेश 

खरना मतलब केवल उपवास नहीं, बल्कि अपने मन, विचार और कर्म को पूर्णतः शुद्ध और अनुशासित करना। पूजा के सभी नियमों का कठोरता से पालन, वातावरण की सफाई और बाल-बच्चे समेत पूरे परिवार का एकजुट होना, इस पर्व को और भी भावनात्मक बना देता है। यही नहीं, प्रसाद की निर्मलता और उसे आत्मीयता से बांटने की परंपरा, सामाजिक एकता और प्रेम का प्रतीक है।