लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: भारत की संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के मूल्यों, रिश्तों और संस्कारों का संदेश भी देते हैं। तीज ऐसा ही पर्व है, जिसमें आस्था, प्रेम, समर्पण, धैर्य और नारी सम्मान की भावना एक साथ दिखाई देती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी अटूट श्रद्धा, धैर्य और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी कथा की स्मृति में तीज का पर्व मनाया जाता है।
उक्त जाानकारी लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
लेकिन तीज का अर्थ केवल व्रत, पूजा और श्रृंगार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे जीवन का एक गहरा संदेश छिपा है। यह पर्व हमें बताता है कि सच्चे रिश्ते केवल प्रेम से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, त्याग और परस्पर सहयोग से मजबूत होते हैं। माता पार्वती की तपस्या दृढ़ संकल्प और धैर्य की प्रेरणा देती है, वहीं शिव-पार्वती का संबंध दांपत्य जीवन में प्रेम और सम्मान का प्रतीक है।
आज जब जीवन की गति तेज हो गई है और आधुनिक सुविधाओं के बावजूद रिश्तों में दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है, तब तीज का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। परिवार में साथ रहना ही पर्याप्त नहीं है, एक-दूसरे को समझना, समय देना और भावनाओं का सम्मान करना भी जरूरी है।
तीज हमें यह भी सोचने का अवसर देता है कि नारी केवल परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाली नहीं, बल्कि परिवार और समाज के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति है। इसलिए तीज के अवसर पर महिलाओं के व्रत और श्रृंगार के साथ उनके सम्मान, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सपनों की भी बात होनी चाहिए।
समय बदल रहा है और बदलते समय के साथ परंपराओं को देखने का नजरिया भी बदलना स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी संस्कृति से दूर हो जाएं। आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं के भीतर छिपे सकारात्मक संदेश को समझें और उसे आधुनिक जीवन में अपनाएं।
आज तीज ऐसा पर्व बन सकता है, जहां पूजा के साथ परिवार में संवाद हो, व्रत के साथ आत्मसंयम हो, श्रृंगार के साथ आत्मसम्मान हो और उत्सव के साथ जरूरतमंदों की सहायता की भावना भी हो। नई पीढ़ी को भी तीज की कथा केवल धार्मिक प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि उसके भावार्थ के साथ समझाने की जरूरत है। उन्हें बताया जाना चाहिए कि हमारी संस्कृति हमें प्रेम करना, रिश्तों का सम्मान करना, कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ रहना सिखाती है।
पर्व तभी सार्थक होते हैं, जब उनकी परंपरा के साथ उनकी भावना भी जीवित रहे। तीज की सुंदरता इसी में है कि इसकी जड़ें प्राचीन परंपरा में हैं, लेकिन इसका संदेश आज भी उतना ही उपयोगी है। तीज हमें सिखाता है कि आस्था मन को शक्ति देती है, धैर्य जीवन को दिशा देता है, प्रेम रिश्तों को जोड़ता है और सम्मान उन्हें स्थायी बनाता है। यही तीज की सच्ची प्रासंगिकता और इसका वास्तविक भावार्थ है।







