दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका खारिज की, ₹10,000 के बॉन्ड पर मजिस्ट्रेट को दिए निर्देश
नेशनल डेस्क, शुभम कुमार तिवारी।
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 के बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त को चुनौती दी थी। हालांकि, अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि कार्यवाही में इस्तेमाल किए गए सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड नेहा बोरा को उपलब्ध कराए जाएं।
समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला शांति भंग होने की आशंका को लेकर शुरू की गई निवारक कार्यवाही से जुड़ा है। बोरा ने अदालत में दलील दी थी कि उनके खिलाफ जारी नोटिस और संबंधित प्रक्रिया में कानूनी आधार तथा आवश्यक दस्तावेजों को लेकर सवाल हैं।
क्या है पूरा मामला?
नेहा बोरा ने उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने और एक जमानतदार देने को कहा गया था। याचिका में इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए गए थे।
बोरा की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि संबंधित नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और उसके आधार की जांच की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया कि क्या संबंधित कार्यवाही निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप थी।
पुलिस और सरकार ने क्या दलील दी?
राज्य की ओर से अदालत में कहा गया कि पुलिस की रिपोर्ट के साथ सामान्य डायरी की प्रविष्टियां और प्राथमिकी (FIR) जैसे संबंधित रिकॉर्ड भी प्रस्तुत किए गए थे। अधिकारियों की ओर से यह भी बताया गया कि जांच अधिकारी को मामले की परिस्थितियों को स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया था।
राज्य का तर्क था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की संबंधित धाराओं के तहत ऐसी निवारक कार्यवाही का उद्देश्य संभावित शांति भंग होने की स्थिति को रोकना है। सरकार के अनुसार, इस स्तर पर कार्यवाही के परिणामस्वरूप कोई दंडात्मक कार्रवाई या बॉन्ड लागू करने का अंतिम परिणाम सामने नहीं आया था।
हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिया?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि कार्यवाही में जिन दस्तावेजों और सामग्री पर भरोसा किया गया है, उनकी प्रतियां याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाएं।
इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित पक्ष को अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही के आधार और रिकॉर्ड की जानकारी मिल सके। मामले में अदालत के इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप या आशंकाएं साबित हो गई हैं। अदालत ने याचिका पर निर्णय देते हुए दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।







