स्टेट डेस्क, रानी कुमारी।
झारखंडI विजयादशमी के पावन अवसर पर जब देश के कोने-कोने में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मनाया जाता है, तब झारखंड की धार्मिक-आध्यात्मिक राजधानी देवघर में यह परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां रावण के पुतले नहीं जलाए जाते। बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी इस अनोखी परंपरा के पीछे भगवान शिव के प्रति रावण की अटूट भक्ति और ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी गहरी धार्मिक मान्यता है।
रावण को यहां केवल राक्षसराज या बुराई का प्रतीक नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें भगवान शिव का परम भक्त और ज्योतिर्लिंग की स्थापना का निमित्त माना जाता है। इसी कारण देवघर के लोग विजयादशमी के दिन रावण दहन से परहेज करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं।
पौराणिक कथा: कैसे स्थापित हुआ बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके कैलाश से आत्मलिंग (शिवलिंग) प्राप्त किया था। रावण इस शिवलिंग को लंका ले जाना चाहते थे, लेकिन शर्त यह थी कि रास्ते में कहीं भी शिवलिंग रखने पर वह उसी स्थान पर स्थापित हो जाएगा।
जब रावण शिवलिंग लेकर जा रहे थे, तो रास्ते में उन्हें लघु शंका हुई। उन्होंने चरवाहे का रूप धारण किए भगवान विष्णु से शिवलिंग कुछ देर के लिए पकड़ने का अनुरोध किया। रावण के लौटने से पहले ही भगवान विष्णु ने शिवलिंग को धरती पर रख दिया। परिणामस्वरूप शिवलिंग देवघर की पावन भूमि पर ही स्थापित हो गया। तभी से यह स्थान बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम से विख्यात हो गया। इसे कामनालिंग और रावणेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है।
मंदिर के तीर्थ पुरोहित बताते हैं कि रावण की कठोर तपस्या और शिवभक्ति के कारण ही देवघर को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक कामनालिंग का गौरव प्राप्त हुआ। इसलिए स्थानीय लोग रावण को राक्षस की बजाय शिवभक्त और विद्वान के रूप में सम्मान देते हैं।
स्थानीय आस्था और परंपरा
बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, “ऐसा नहीं है कि देवघर में रावण को बुराई का प्रतीक नहीं माना जाता, लेकिन हमारी संस्कृति में कृतघ्नता की परंपरा नहीं रही है। रावण यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना का निमित्त बना, इसलिए उनके पुतले जलाने की परंपरा नहीं है।”
कुछ स्थानीय धर्माचार्य और पंडा यह भी बताते हैं कि मंदिर की पूजा पद्धति में कभी-कभी “श्री श्री 108 रावणेश्वर बाबा वैद्यनाथ” मंत्र का उच्चारण भी होता है। यहां पहले रावण और फिर बाबा बैद्यनाथ की पूजा की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है। देवघर जिले के कुछ अन्य क्षेत्रों जैसे मधुपुर में रावण दहन की परंपरा प्रचलित है, लेकिन बाबाधाम नगर में यह आयोजन निषिद्ध माना जाता है। स्थानीय लोग दशहरा को शिव-शक्ति की आराधना और रावण की भक्ति की स्मृति के साथ मनाते हैं।







