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दो कमरे वाले स्कूल की छात्राओं ने किया कमाल

लोकल डेस्क, मुस्कान कुमारी।

  • जमुई के उत्क्रमित मध्य विद्यालय थेगुआ की छात्राओं ने ‘जीरो वेस्ट थाली’ और केले के पत्तों से फूड पैकेजिंग के विचार से बनाई पहचान

जमुई। बिहार के जमुई जिले के एक सरकारी स्कूल की छात्राओं ने सीमित संसाधनों के बीच विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाई है। जमुई सदर प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय थेगुआ की छात्राओं के दो प्रोजेक्ट जिला स्तरीय विज्ञान मेले में टॉप-10 में शामिल हुए हैं। अब इन दोनों प्रोजेक्ट का चयन राज्य स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी के लिए किया गया है।

स्कूल में केवल दो कमरे हैं। पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चों की पढ़ाई बरामदे में होती है। इसके बावजूद छात्राओं ने ऐसे विषयों पर काम किया, जिनका संबंध रोजमर्रा की जिंदगी, भोजन की बर्बादी रोकने और पर्यावरण संरक्षण से है। उनके प्रोजेक्ट में एक ओर स्कूलों में मिड डे मील के दौरान भोजन की बर्बादी कम करने का विचार है, तो दूसरी ओर पैकेजिंग के लिए केले के पत्तों जैसे स्थानीय विकल्प के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

भोजन की बर्बादी रोकने के लिए ‘जीरो वेस्ट थाली’

छात्राओं का पहला प्रोजेक्ट ‘जीरो वेस्ट थाली’ है। इसका उद्देश्य स्कूलों में मध्याह्न भोजन यानी मिड डे मील के दौरान खाने की बर्बादी को कम करने के उपाय तलाशना है। स्कूलों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन कई बार खाना प्लेट में बच जाता है। इससे भोजन की बर्बादी होती है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए छात्राओं ने ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया, जो बच्चों में भोजन के प्रति जिम्मेदारी की भावना बढ़ाने पर केंद्रित है। उन्होंने इस विषय पर करीब डेढ़ महीने तक काम किया। इस दौरान उनका प्रयास रहा कि भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए उपयोगी उपाय सामने लाए जा सकें।

भोजन की बर्बादी केवल खाने को फेंकने तक सीमित समस्या नहीं है। इसके पीछे भोजन उगाने, तैयार करने और उसे बच्चों तक पहुंचाने में लगने वाले संसाधन भी जुड़े हैं। इसलिए बच्चों को जरूरत के अनुसार भोजन लेने और थाली में खाना न छोड़ने के लिए जागरूक करना महत्वपूर्ण है।

‘जीरो वेस्ट थाली’ इसी सोच को सामने लाती है। अगर स्कूलों में बच्चों को भोजन की अहमियत समझाई जाए और भोजन वितरण के दौरान सही प्रबंधन किया जाए, तो खाने की बर्बादी कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इस प्रोजेक्ट के तकनीकी मॉडल, उसके परीक्षण और बर्बादी कम करने के मापे गए परिणामों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।

केले के पत्तों से पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग

छात्राओं का दूसरा प्रोजेक्ट पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है। इसमें खाने की पैकेजिंग के लिए केले के पत्तों के इस्तेमाल का विचार पेश किया गया है। आज भोजन को पैक करने के लिए अलग-अलग तरह की सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। ऐसे में पर्यावरण के अनुकूल विकल्प तलाशना जरूरी है।

केले के पत्ते कई इलाकों में आसानी से उपलब्ध होते हैं और पारंपरिक रूप से भोजन परोसने या लपेटने के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। छात्राओं ने इसी स्थानीय संसाधन को पैकेजिंग के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

इस विचार का उद्देश्य ऐसी सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जो पर्यावरण पर कम बोझ डाले। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करने से कुछ परिस्थितियों में पैकेजिंग के दूसरे विकल्पों पर निर्भरता कम की जा सकती है। हालांकि, किसी भी विकल्प की उपयोगिता उसकी मजबूती, स्वच्छता, लागत, उपलब्धता और इस्तेमाल के बाद निपटान जैसे पहलुओं पर भी निर्भर करती है।

इसलिए केले के पत्तों से पैकेजिंग का विचार पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक उपयोगी संभावना पेश करता है। इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि इसे किन परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है और यह दूसरे विकल्पों की तुलना में कितना व्यावहारिक है।

जिला विज्ञान मेले में दोनों प्रोजेक्ट टॉप-10 में

शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित जिला स्तरीय विज्ञान मेले में उत्क्रमित मध्य विद्यालय थेगुआ की छात्राओं के दोनों प्रोजेक्ट टॉप-10 में शामिल हुए। इसके बाद इन्हें राज्य स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी के लिए चुना गया।

यह चयन छात्राओं के लिए अपने विचारों को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर है। जिला स्तर पर मिली पहचान के बाद वे अब राज्य स्तर पर अपने प्रोजेक्ट के जरिए अपनी समझ और रचनात्मकता दिखा सकेंगी।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन प्रोजेक्ट पर स्कूल की चार छात्राओं ने मिलकर काम किया। छात्राओं मुस्कान कुमारी और सोनाक्षी कुमारी के नाम भी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। हालांकि, दोनों प्रोजेक्ट में किस छात्रा की क्या भूमिका रही और चारों छात्राओं के नामों का पूरा विवरण उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।

राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में चयन का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि ऐसे मंचों पर विद्यार्थियों को अपने विचार समझाने और दूसरे प्रतिभागियों के काम से सीखने का अवसर मिलता है। इससे विज्ञान को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा की समस्याओं से जोड़कर देखने की समझ विकसित हो सकती है।

शिक्षक के मार्गदर्शन में तैयार हुए प्रोजेक्ट

विद्यालय के विज्ञान शिक्षक रागिब हुसैन का मानना है कि संसाधनों की कमी बच्चों की प्रतिभा के विकास में बाधा नहीं बननी चाहिए। सही मार्गदर्शन, मेहनत और सीखने के अवसरों से सीमित सुविधाओं वाले स्कूलों के विद्यार्थी भी विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकते हैं।

थेगुआ स्कूल की छात्राओं के प्रोजेक्ट इसी बात को सामने रखते हैं कि वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए आसपास की समस्याओं को समझना और उनके संभावित समाधान तलाशना जरूरी है। भोजन की बर्बादी रोकने और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग जैसे विषय बच्चों के रोजमर्रा के अनुभवों से जुड़े हैं। इस वजह से वे इन समस्याओं को करीब से समझ सकती हैं और अपने स्तर पर समाधान के विचार पेश कर सकती हैं।

स्कूल में कमरों की कमी और बरामदे में पढ़ाई जैसी चुनौतियों के बीच छात्राओं का राज्य स्तरीय प्रदर्शनी के लिए चयनित होना उल्लेखनीय है। यह उपलब्धि सरकारी स्कूलों में मौजूद प्रतिभा और उसे आगे बढ़ाने में शिक्षकों के मार्गदर्शन की भूमिका को भी सामने लाती है।