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दो पड़ोसी, एक ही कहानी: बांग्लादेश के बाद नेपाल में भी सत्ता का तख्तापलट

स्पेशल रिपोर्ट, नीतीश कुमार |

भारत के दो पड़ोसी मुल्क, एक नेपाल और दूसरा बांग्लादेश, दोनों ही देशों में शीर्ष नेताओं को आंदोलनों के कारण पद छोड़ना पड़ा। जो सत्ता परिवर्तन का कारण बना।

समानांतर सत्ता परिवर्तन की कहानी

भारत की सीमा से लगे दो पड़ोसी मुल्कों में एक अजीब संयोग देखने को मिला है। पहले 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की शेख हसीना को जनता के गुस्से के आगे झुकना पड़ा और अब नेपाल के केपी शर्मा ओली का भी यही हाल हुआ है। दोनों ही नेताओं को अपने-अपने देश की आग से बचने के लिए सत्ता छोड़नी पड़ी।

हैरानी की बात यह है कि दोनों देशों में विरोध का पैटर्न बिल्कुल एक जैसा रहा - पहले छोटी मांग, फिर बड़ा आंदोलन, और अंत में पूर्ण सत्ता परिवर्तन।

क्रांति से सत्ता, क्रांति से पतन

इतिहास का यह किस्सा दिलचस्प है। बांग्लादेश में अवामी लीग ने कभी 50 साल पहले क्रांति का झंडा बुलंद किया था, लेकिन आज उसी पार्टी को दूसरी क्रांति ने उखाड़ फेंका। नेपाल में भी यही खेल हुआ - कम्युनिस्ट पार्टी ने राजशाही को हराया था, लेकिन अब जनता उसी पार्टी से तंग आकर राजशाही की वापसी की मांग कर रही है। यह एक अजीब चक्र है जहां कल के क्रांतिकारी आज के तानाशाह बन गए।

युवाओं का जमाना

दोनों देशों में आंदोलन की कमान युवाओं के हाथ में रही। बांग्लादेश में 'स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन' ने शेख हसीना को हिला दिया, तो नेपाल में Gen-Z ने पहले सोशल मीडिया बैन के खिलाफ आवाज उठाई और फिर पूरी सरकार को ही निशाना बना लिया। आज के दौर में युवा सिर्फ मोबाइल नहीं चलाते, बल्कि सरकारें भी बदल देते हैं।

जब बल भी बेकार हो गया

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि दोनों सरकारों ने ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया। बांग्लादेश में 1,500 से ज्यादा लोग मारे गए, नेपाल में 22 लोगों की जान गई। लेकिन जितना दमन हुआ, उतना ही विरोध भड़का। यह साबित हो गया कि आज के जमाने में लाठी-गोली से जनता का गुस्सा नहीं दबाया जा सकता। जनता जब ठान लेती है तो सारी ताकत फेल हो जाती है।

एक जैसा अंजाम

अंत में दोनों नेताओं का हश्र एक जैसा हुआ। शेख हसीना को ढाका छोड़कर भागना पड़ा जब प्रदर्शनकारी उनके घर तक पहुंच गए। केपी शर्मा ओली भी पहले अड़े रहे, लेकिन अंत में उन्हें भी Gen Z के आंदोलन के आगे नतमस्तक होना पड़ा है। यह कहानी बताती है कि चाहे कोई कितना भी ताकतवर हो, जब जनता के धैर्य का बांध टूट जाता है, तो कुर्सी की सारी मजबूती धराशायी हो जाती है।