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धैर्यवान होना ही जीवन में सफलता की कसौटी: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: धैर्यवान होना एक अच्छा गुण है,लेकिन रख पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता है।धैर्य,प्रतीक्षा करने की कला है।जो सीमा धैर्य की होती है, वही हमारी उम्मीदों की भी होती है।

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।हम सभी जानते हैं कि कार्य करने की अलग गति होती है और उसका परिणाम पाने की अलग,लेकिन इनके मध्य धैर्य की समय सीमा होती है,जिसे पार करना पड़ता है और इस समय सीमा में होती हैं - उम्मीदें,बेचैनी, झुंझलाहट,जिन्हें धैर्य के साथ सहना पड़ता है।व्यक्ति जब किसी भी कार्य को जल्दबाजी में करने का प्रयत्न करता है तो वह सत्य एवं वास्तिवकता को अनुभव नहीं कर पाता है और बेचैनी में किए गए कार्यों के कारण कई बार उसे निराशा का भी सामना करना पड़ता है।जो व्यक्ति किसी भी कार्य को हड़बड़ी में संपादित करता है,धैर्य से काम नहीं लेता,वह अपने कम समय में संपन्न होने वाले कार्य को घंटों के कार्य में बदल देता है।

हड़बड़ाहट में कार्य बिगड़ने लगते हैं और फिर उन्हें सुधारने में समय लगता है।धैर्य न धारण कर पाने के कारण कई बार व्यक्ति के कदम गलत दिशा में मुड़ जाते हैं।धैर्य की कमी ही हड़बड़ाहट को जन्म देती है।व्यक्ति जैसे ही धैर्य खोता है,वह एक तरह से सफलता की संभावना को नकार बैठता है। संसार के प्रमुख धनवान व्यक्ति वॉरेन बफेट के अनुसार " जो भी आपको अपने से जितना ज्यादा आगे दिख रहा है,वह उसी अनुपात में आपसे ज्यादा धैर्यवान है।"

धैर्य के साथ व्यक्ति यदि जीवन जिये तो वह भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी करता है।धैर्य व्यक्ति की हर अंतहीन इच्छा को दिशा देने के साथ-साथ एक जीवन जीने का उद्देश्य भी दे सकता है।अगर व्यक्ति में धैर्य है तो वह 100 में से 100 नंबर का हकदार होता है और अगर धैर्य नहीं है तो वह शून्य के पायदान पर स्वयं को खड़ा पाता है।इतनी अनमोल विरासत है - धैर्य की। धैर्य रखना सर्वोत्तम गुण ही नहीं अपितु एक कौशल भी है।जिसका अर्थ बिना आपा या आस खोये,देरी,मुसीबत और झुंझलाहट के क्षणों को स्वीकारने या सहने की क्षमता।