नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी।
- 13 अक्टूबर को मां चंद्रघंटा की आराधना, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, प्रिय भोग, मंत्र और महिषासुर वध की पौराणिक कथा।
नई दिल्ली। शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन आज मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जा रही है। धार्मिक मान्यताओं में मां चंद्रघंटा को साहस, शक्ति और शांति का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भक्त विधि-विधान से पूजा करते हैं और सुख-शांति की कामना करते हैं।
मां चंद्रघंटा के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। मान्यता है कि उनकी आराधना से भक्तों को साहस और आत्मविश्वास की प्रेरणा मिलती है। नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए तिथि, पूजा का समय, भोग और मंत्र से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण है।
मां चंद्रघंटा की पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, नवरात्रि की तृतीया तिथि 12 अक्टूबर 2026 की रात 10 बजकर 13 मिनट पर शुरू हुई और 13 अक्टूबर की रात 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। अमृत काल शाम 4 बजकर 14 मिनट से 5 बजकर 57 मिनट तक रहेगा।
हालांकि, पूजा के मुहूर्त की गणना स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए अपने शहर में पूजा का समय तय करने के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा।
धार्मिक परंपरा में पूजा के समय से अधिक श्रद्धा और नियमपूर्वक आराधना को महत्व दिया जाता है। जो भक्त किसी कारण से बताए गए मुहूर्त में पूजा नहीं कर पाते, वे अपनी सुविधा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार भी पूजा कर सकते हैं।
कैसे करें मां चंद्रघंटा की पूजा?
नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर पूजा की तैयारी की जाती है। सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करें और मां दुर्गा के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद मां चंद्रघंटा का ध्यान करके पूजा का संकल्प लें।
पूजा के दौरान मां को लाल और पीले रंग के फूल अर्पित किए जा सकते हैं। इसके साथ कुमकुम, अक्षत, धूप और दीप चढ़ाएं। फल और मिठाई का भोग लगाकर मां की आरती करें। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा चालीसा का पाठ और मंत्र जाप भी कर सकते हैं।
पूजा के बाद परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद बांटने की परंपरा है। पूजा सामग्री और विधि में परिवारों तथा क्षेत्रों के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक विधि को सभी के लिए अनिवार्य मानना सही नहीं होगा।
मां चंद्रघंटा को किस चीज का भोग लगाएं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बने पकवानों का भोग प्रिय माना जाता है। इस दिन खीर चढ़ाने की परंपरा भी है। कुछ भक्त केसर, इलायची और मेवों से तैयार मिठाई का भोग लगाते हैं।
भोग तैयार करते समय साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और उपलब्ध सामग्री के अनुसार फल, मिठाई या अन्य सात्विक पकवान भी अर्पित कर सकते हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भोग की परंपराएं अलग हो सकती हैं। किसी खास पकवान को चढ़ाना ही पूजा का एकमात्र तरीका नहीं है। पूजा में श्रद्धा और अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन प्रमुख माना जाता है।
कैसी हैं मां चंद्रघंटा की दस भुजाएं?
मां चंद्रघंटा को देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक चित्रण में वे सिंह पर सवार दिखाई देती हैं। उनकी दस भुजाओं में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र और प्रतीक दिखाए जाते हैं। इनमें त्रिशूल, तलवार, चक्र, धनुष, गदा और अन्य अस्त्र शामिल हैं।
उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनकी सबसे खास पहचान है। धार्मिक मान्यताओं में उनका स्वरूप एक ओर शांत और कल्याणकारी, तो दूसरी ओर अन्याय और बुराई के खिलाफ शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
मां चंद्रघंटा की पूजा का संदेश साहस, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा से भी जोड़ा जाता है। भक्त उनसे जीवन में सुख-शांति और बाधाओं से निपटने की शक्ति की कामना करते हैं। ये धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी मान्यताएं हैं, जिन्हें श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार मानते हैं।
मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नाम के असुर ने अपनी शक्ति बढ़ाकर देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने स्वर्ग पर अधिकार करने का प्रयास किया, जिससे देवता चिंतित हो गए। इसके बाद देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी।
कथा में बताया गया है कि देवताओं की शक्तियों से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। देवताओं ने उन्हें अपनी-अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में अस्त्र-शस्त्र दिए। भगवान शिव ने त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र दिया। अन्य देवताओं ने भी देवी को विभिन्न अस्त्र प्रदान किए।
इसके बाद देवी और महिषासुर के बीच युद्ध हुआ। कथा के अनुसार, देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। इस कथा को बुराई पर अच्छाई की जीत और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
मां चंद्रघंटा के स्वरूप से जुड़ी यह कथा श्रद्धालुओं को साहस, शक्ति और धर्म की रक्षा का संदेश देती है। नवरात्रि में इस कथा का स्मरण देवी की आराधना का हिस्सा माना जाता है।
मां चंद्रघंटा का मंत्र
मां चंद्रघंटा की पूजा में मंत्र जाप भी किया जाता है। उनका उपासना मंत्र इस प्रकार है—
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
इसके अलावा कुछ भक्त “ऐं श्रीं शक्तयै नमः” मंत्र का जाप भी करते हैं। मंत्रों के उच्चारण और पाठ की परंपरा अलग-अलग पूजा पद्धतियों में भिन्न हो सकती है।
श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार मंत्र का जाप कर सकते हैं। पूजा के दौरान शांत मन से ध्यान करना और अपनी आस्था के अनुसार आराधना करना महत्वपूर्ण माना जाता है।







