लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य इस दुनिया में केवल अपना नाम बनाने के लिए नहीं आता, बल्कि ऐसा जीवन जीने के लिए आता है, जिसे उसके जाने के बाद भी लोग अच्छे शब्दों में याद करें। व्यक्ति की असली पहचान उसके पद, धन या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके विचारों, व्यवहार, संस्कार और कर्मों से बनती है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल शख्स बनकर जीना नहीं, बल्कि शख्सियत बनकर जीना चाहिए।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में हर व्यक्ति स्वयं को साबित करने की होड़ में लगा हुआ है। लोग चाहते हैं कि दुनिया उन्हें देखे, उनकी प्रशंसा करे और उनकी उपलब्धियों को स्वीकार करे। लेकिन वास्तविक महानता दूसरों की नजरों में बड़ा दिखने में नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा की नजरों में सम्मानित बनने में है। कई बार खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है। नींव के पत्थर कभी बोलते नहीं, लेकिन पूरी इमारत उन्हीं के सहारे खड़ी होती है। इसी तरह जीवन में शांत रहकर किए गए अच्छे कर्म व्यक्ति की सबसे मजबूत पहचान बनते हैं।
जब संसार की अशांति मन को विचलित करने लगे, तब मनुष्य को कुछ समय अपने अंतर्मन की ओर भी देखना चाहिए। बाहरी दुनिया को बदलने से पहले स्वयं को समझना जरूरी है। जीवन में दुःख का एक बड़ा कारण यह भी है कि सच्चे लोगों को अक्सर समझने में देर लगती है और गलत लोगों को पहचानने में भी लोग चूक जाते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को दूसरों के व्यवहार से अधिक अपने चरित्र पर ध्यान देना चाहिए।
चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। धन और पद समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन अच्छे चरित्र की छाप लंबे समय तक बनी रहती है। इसलिए अपने किरदार की रक्षा उतनी ही गंभीरता से करनी चाहिए, जितनी हम अपने जीवन की करते हैं। जीवन समाप्त हो जाने के बाद भी व्यक्ति के कर्म और उसका व्यवहार लोगों की स्मृतियों में जीवित रहते हैं।
सच्ची शख्सियत वही है, जो अपने लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी उपयोगी बने। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी जरूरतमंद का सहारा बनना, सत्य के साथ खड़ा होना और कठिन समय में किसी का हाथ थामना—यही वे छोटे-छोटे कार्य हैं, जो इंसान को बड़ा बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रेम भी केवल शब्दों में व्यक्त करने की वस्तु नहीं है। प्रेम त्याग, विश्वास, समर्पण और अहंकार छोड़ने का नाम है। जहां स्वार्थ और अहंकार समाप्त होते हैं, वहीं सच्चे प्रेम का जन्म होता है। इसी प्रकार किताबें स्वयं मौन रहती हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने वाला व्यक्ति जीवन को समझने, विचार करने और सही बात कहने की कला सीखता है।
दुनिया कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, अपने घर का सुकून, अपनापन और रिश्तों की गर्माहट का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। आज मनुष्य सुविधाओं के बीच रहते हुए भी मानसिक रूप से परेशान है, क्योंकि उसने संतोष और आत्मिक शांति को पीछे छोड़ दिया है। जीवन को सुखी बनाने के लिए हर चीज को नियंत्रित करना जरूरी नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना जरूरी है कि कुछ परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर भी होती हैं।
चिंता किसी समस्या का समाधान नहीं करती। इसके विपरीत, वह वर्तमान के आनंद को कम कर देती है। इसलिए जो हमारे हाथ में है, उस पर ईमानदारी से काम करना चाहिए और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसे लेकर निरंतर चिंता करने से बचना चाहिए। सकारात्मक सोच के साथ परिस्थितियों को स्वीकार करना जीवन को सरल और शांत बनाता है।
जीवन में विरोध और असहमति भी स्वाभाविक हैं। यदि कोई व्यक्ति कभी किसी के विरोध का सामना ही नहीं करता, तो उसे यह भी विचार करना चाहिए कि कहीं उसने उन परिस्थितियों में भी मौन तो नहीं साध लिया, जहां सत्य के पक्ष में आवाज उठाना आवश्यक था। हर जगह चुप रहना समझदारी नहीं होती। जहां अन्याय हो, वहां सत्य के साथ खड़ा होना ही एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक की पहचान है।
दुःख का एक कारण श्रेष्ठ कर्मों का अभाव, सुख का आधार अच्छे कर्मों का प्रभाव और अशांति का एक बड़ा कारण हमारा अपना स्वभाव हो सकता है। इसलिए जीवन को केवल वर्षों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके भीतर किए गए अच्छे कार्यों और बनाए गए सुंदर संबंधों में मापना चाहिए।
अंततः जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने पीछे ऐसी पहचान छोड़ जाएं, जिसे समय भी मिटा न सके। नाम कुछ समय तक याद रहता है, लेकिन अच्छे कर्म पीढ़ियों तक याद किए जाते हैं। इसलिए शख्स बनने की चिंता छोड़कर शख्सियत बनने का प्रयास करें।
क्योंकि शख्स एक दिन विदा हो जाता है, लेकिन सच्ची शख्सियत अपने विचारों, संस्कारों और कर्मों के माध्यम से हमेशा जीवित रहती है।
मस्त रहें, आनंदित रहें और अपने जीवन को दूसरों के लिए भी उपयोगी बनाएं।






