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परमाणु समझौते पर अमेरिका पर नहीं भरोसा : ईरान

विदेश डेस्क, मुस्कान सिंह।

तेहरान: ईरान ने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में वाशिंगटन के साथ किसी भी नए परमाणु समझौते पर भरोसा करना मुश्किल है।

ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सलाहकार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के पूर्व कमांडर-इन-चीफ मोहसिन रेजाई ने कहा कि वर्ष 2015 के परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से अमेरिका के एकतरफा हटने के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट और गहरा गया है।
तेहरान में मीडिया से बातचीत के दौरान रेजाई ने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर फिलहाल कोई सक्रिय बातचीत नहीं चल रही है। उन्होंने कहा कि यदि वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, तो इसके लिए पहल अमेरिका और विशेष रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को करनी होगी। ईरान की ओर से स्पष्ट संकेत दिया गया है कि बिना भरोसे के किसी भी नई वार्ता को आगे बढ़ाना संभव नहीं होगा।
रेजाई ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वाशिंगटन फिर से सैन्य दबाव या आक्रामक नीति अपनाने की कोशिश करता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सैन्य कार्रवाई से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ेगा तथा इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।
उन्होंने दावा किया कि यदि युद्ध या आर्थिक नाकेबंदी जैसी परिस्थितियां जारी रहती हैं, तो संघर्ष का दायरा फारस की खाड़ी से आगे हिंद महासागर, लाल सागर, बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और भूमध्य सागर तक फैल सकता है। इस बयान को क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
 ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरी पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना सकती है। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में वार्ता प्रक्रिया का ठप पड़ना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय माना जा रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच हुए संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) समझौते का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना था। हालांकि बाद में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने के बाद इस पर संकट गहरा गया। ताजा बयान से संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और कूटनीतिक संवाद की राह अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।