विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
इस्लामाबाद। पाकिस्तान में एक नाबालिग ईसाई लड़की से जुड़े मामले में अदालत के फैसले को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। 13 वर्षीय ईसाई लड़की की हिरासत उस मुस्लिम व्यक्ति को सौंपे जाने के बाद मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों ने न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। संबंधित व्यक्ति पर लड़की के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह कराने के आरोप लगाए गए हैं। मामले ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
जानकारी के अनुसार, यह मामला फैसलाबाद की अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आया। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश राणा सोहेल ने नाबालिग लड़की एम्बर नदीम के उस शपथ पत्र को स्वीकार कर लिया, जिसमें उसने दावा किया कि उसने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया और मोहसिन लियाकत नामक व्यक्ति से स्वेच्छा से विवाह किया है। शपथ पत्र में यह भी कहा गया कि उसका अपहरण नहीं किया गया था। अदालत ने इसी आधार पर आगे की कार्रवाई की।
हालांकि, मानवाधिकार संगठन ‘वॉयस फॉर जस्टिस’ के अध्यक्ष जोसेफ जैनसेन ने इस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अदालत ने यह निर्णय उस समय सुनाया, जब लड़की की वास्तविक उम्र निर्धारित करने के लिए अदालत के आदेश पर कराया जाने वाला चिकित्सकीय परीक्षण अभी पूरा नहीं हुआ था। उनके अनुसार, उम्र की पुष्टि से पहले इस प्रकार का फैसला न्यायिक प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े करता है।
मामले में आरोपित मोहसिन लियाकत को गिरफ्तारी के बाद अदालत ने जमानत भी दे दी। रिपोर्ट के अनुसार, लड़की द्वारा अदालत में बयान दर्ज कराने के बाद उसे आरोपित के साथ जाने की अनुमति मिल गई। इस फैसले के बाद आरोपी न्यायिक हिरासत से बाहर आ गया और आगे की कानूनी प्रक्रिया जमानत पर जारी रहेगी।
जोसेफ जैनसेन ने दावा किया कि अदालत की कार्यवाही समाप्त होने के बाद एम्बर नदीम आरोपी के रिश्तेदारों और उसके वकीलों के साथ अदालत परिसर से बाहर चली गई, जबकि उसके माता-पिता न्याय की उम्मीद में अदालत में मौजूद रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार स्वयं को असहाय महसूस कर रहा है और पूरे मामले में उन्हें न्याय नहीं मिल सका।
इस घटना के सामने आने के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार, जबरन धर्म परिवर्तन और नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा को लेकर फिर से बहस तेज हो गई है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, पीड़ित की वास्तविक उम्र का वैज्ञानिक सत्यापन और स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि किसी भी नाबालिग के अधिकारों और न्याय के सिद्धांतों से समझौता न हो सके।







