स्टेट डेस्क, प्रीति पायल |
बिहार के ग्रामीण इलाकों में विकास के दावों की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सरकारी योजनाओं में प्लानिंग की साफ कमी से करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट बेकार पड़े सड़क किनारे खड़े हैं। आज तक की ग्राउंड रिपोर्ट दो चौंकाने वाले मामलों को सामने लाई है, जो बताते हैं कि विभागीय लापरवाही और मंजूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी से जनता को राहत नहीं मिल पा रही।
अररिया में करीब 10 साल पहले (2016 के आसपास) एक पुल बनकर तैयार हो गया। संरचना पूरी तरह मजबूत है, लेकिन पुल से जुड़ने वाली एप्रोच रोड आज तक नहीं बनी। नतीजतन, लोग पुल तक पहुंच ही नहीं पाते। यह बेकार पड़ा पुल विकास के झूठे दावों की पोल खोलता है; पैसे खर्च हो गए, लेकिन फायदा जनता को कहां?
किशनगंज का उल्टा मामला: रोड-पुलिया बनी, मुख्य पुल गुम
किशनगंज के धूम गांव में खेतों के बीच एप्रोच रोड के साथ एक छोटी पुलिया बनवा दी गई। लेकिन नदी पर प्रस्तावित मुख्य बड़ा पुल अब तक नहीं बना। इसका प्रस्ताव सरकारी स्तर पर लंबे समय से अटका है, मंजूरी नहीं मिली। जिलाधिकारी ने अब जांच के आदेश जारी किए हैं। बिना मुख्य पुल के यह सारी व्यवस्था बेकार है; लोगों की परेशानी जस की तस बनी हुई।
ये उदाहरण बिहार के गांवों में फैली ऐसी कई कहानियों का प्रतीक हैं। ठेकेदारों, विभागों और मंजूरी प्रक्रिया में लापरवाही से सवाल उठ रहे हैं—योजनाओं की प्राथमिकता कैसे तय होती है? स्थानीय लोग त्रस्त हैं और केंद्रीय जांच की मांग कर रहे हैं। विकास के नाम पर हो रही यह बर्बादी कब रुकेगी?







