लोकल डेस्क, ऋषि राज।
बदलते हिमालय, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता मानवीय दबाव भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी
रक्सौल: प्रकृति ने मनुष्य को जीवन दिया, संसाधन दिए और सुरक्षित रहने के लिए धरती का एक सुंदर संतुलन भी दिया। लेकिन विकास और आधुनिक सुविधाओं की अंधी दौड़ में मनुष्य इसी प्रकृति का लगातार दोहन करता चला गया। आज प्रकृति का बदलता स्वरूप हमें चेतावनी दे रहा है कि यदि समय रहते हमने अपनी जीवनशैली और विकास की दिशा पर विचार नहीं किया, तो आने वाला समय बेहद भयावह हो सकता है।
वर्तमान में नेपाल की परिस्थितियों को ही देखें। हिमालय, जो सदियों से अपनी विशालता और स्थिरता के लिए जाना जाता रहा है, आज जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के बढ़ते दबाव से प्रभावित हो रहा है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल पहाड़ों के लिए चिंता का विषय नहीं है, बल्कि इससे नदियों, जलस्रोतों और करोड़ों लोगों के भविष्य पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
दूसरी ओर, नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र और किनारों पर तेजी से बढ़ती बस्तियां भविष्य के खतरे को और बढ़ा रही हैं। जब नदी अपने स्वाभाविक रास्ते से बहती है तो वह जीवनदायिनी होती है, लेकिन उसके रास्ते में अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण होने पर वही नदी विनाश का कारण बन सकती है। बाढ़ और भू-स्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव ऐसे क्षेत्रों में कई गुना बढ़ जाता है।
पहाड़ों का अनियंत्रित दोहन भी गंभीर चिंता का विषय है। सड़क, भवन और अन्य निर्माण के नाम पर पहाड़ों को काटना, जंगलों का विनाश और प्राकृतिक संरचनाओं से छेड़छाड़ पहाड़ों की संवेदनशीलता बढ़ा रही है। पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं हैं; वे जल, जंगल, जैव विविधता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के आधार हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं। विकास तो आवश्यक है, लेकिन विकास की कीमत प्रकृति का विनाश नहीं हो सकती। हमें ऐसा विकास चाहिए जो सड़क और भवन के साथ जंगल भी बचाए, रोजगार के साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रखे और वर्तमान की जरूरतों को पूरा करते हुए आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का भी सम्मान करे।
प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है। बदलता मौसम, असामान्य वर्षा, बाढ़, भू-स्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना और जलस्रोतों में बदलाव हमें यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि आखिर हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
यदि आज भी हमने प्रकृति की आवाज को अनसुना किया, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल जरूर करेंगी कि जब खतरे के संकेत स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, तब हमने अपनी विकास की परिभाषा क्यों नहीं बदली?
प्रकृति पर अधिकार जमाने की नहीं, उसके साथ संतुलन बनाकर चलने की आवश्यकता है। क्योंकि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव सभ्यता सुरक्षित रहेगी।







