विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
बलूचिस्तान। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कोयला खदानों में हुए भीषण हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। क्वेटा के पास सोरांगे कोयला क्षेत्र की दो खदानों में मीथेन गैस विस्फोट के बाद आग लगने और खदान धंसने से अब तक 32 मजदूरों की मौत हो चुकी है। राहत और बचाव दल लगातार अभियान चला रहा है, जबकि दो मजदूर अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। खदान के भीतर फैली मीथेन गैस और धुएं के कारण बचाव कार्य बेहद कठिन बना हुआ है।
गुरुवार को हुई इस दुर्घटना की शुरुआत एक निजी कोयला खदान में मीथेन गैस के तेज विस्फोट से हुई। विस्फोट के तुरंत बाद खदान के अंदर आग भड़क उठी और कई हिस्से भरभराकर ढह गए। धमाका इतना शक्तिशाली था कि इसकी आवाज आसपास के कई इलाकों तक सुनाई दी। अधिकारियों के अनुसार, पहली खदान में उस समय करीब 24 मजदूर लगभग 4,000 फीट की गहराई में काम कर रहे थे, जो अचानक हुए हादसे की चपेट में आ गए।
विस्फोट का असर पास की दूसरी कोयला खदान पर भी पड़ा, जहां उस समय 12 मजदूर काम कर रहे थे। तेज धमाके और कंपन के कारण दूसरी खदान भी प्रभावित हुई, जिससे वहां मौजूद मजदूर भी गंभीर खतरे में फंस गए। हादसे के बाद दोनों खदानों में एक साथ राहत और बचाव अभियान शुरू किया गया, लेकिन अंदर का वातावरण बेहद जोखिम भरा होने के कारण अभियान में लगातार मुश्किलें आ रही हैं।
बलूचिस्तान के मुख्य खान निरीक्षक मोहम्मद आतिफ ने बताया कि हादसे के समय दोनों खदानों में कुल 34 मजदूर मौजूद थे। अब तक राहत दल 32 मजदूरों के शव बाहर निकाल चुका है, जबकि दो अन्य मजदूरों की तलाश लगातार जारी है। बचाव दल को उम्मीद है कि वैकल्पिक रास्तों के जरिए खदान के अंदर तक पहुंचकर लापता मजदूरों का पता लगाया जा सकेगा।
बचाव अभियान को तेज करने के लिए खनन इंजीनियरों और विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। प्रभावित हिस्सों तक पहुंचने के लिए नए रास्ते तैयार किए गए हैं, लेकिन खदान के भीतर बड़ी मात्रा में मौजूद मीथेन गैस, धुआं और लगातार लगी आग अभियान में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। इन परिस्थितियों के बीच राहतकर्मी लगातार जोखिम उठाकर अंदर फंसे मजदूरों और शवों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तान में हाल के महीनों में खदानों से जुड़े हादसों की संख्या बढ़ी है। जून में खनन कार्य के दौरान विस्फोटक सामग्री फटने से तीन लोग घायल हो गए थे, जबकि अप्रैल में एक अन्य कोयला खदान दुर्घटना में तीन खनिकों की जान चली गई थी। ताजा हादसे ने एक बार फिर खदानों में सुरक्षा मानकों और श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।







