Ad Image
Ad Image
युद्ध समाप्ति पर ईरान के साथ सकारात्मक बातचीत हुई: राष्ट्रपति ट्रंप || बिहार: विजय कुमार सिन्हा, निशांत कुमार, दिलीप जायसवाल, दीपक प्रकाश समेत 32 ने ली शपथ || बिहार में सम्राट सरकार का विस्तार, 32 मंत्रियों ने ली पद और गोपनीयता की शपथ || वोट चोरी का जिन्न फिर निकला, राहुल गांधी का EC और केंद्र सरकार पर हमला || वियतनामी राष्ट्रपति तो लाम पहुंचे भारत, राष्ट्रपति भवन में पारंपरिक स्वागत || टैगोर जयंती पर 9 मई को बंगाल में भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण की संभावना || केरल में सरकार गठन की कवायद तेज: अजय माकन और मुकुल वासनिक पर्यवेक्षक || असम में बीजेपी जीत के हैट्रिक की ओर, 101 से अधिक पर बढ़त, कांग्रेस 23 पर सिमटी || पांच राज्यों में मतगणना जारी: बंगाल, असम में भाजपा को बढ़त, केरल में कांग्रेस और तमिलनाडु में टीवीके को बढ़त || तमिलनाडु चुनाव: एक्टर विजय की टीवीके ने किया उलटफेर, 109 सीटो पर बढ़त

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

ब्रिटेन का सबसे युवा डिमेंशिया पीड़ित 24 साल में दुनिया छोड़ गया

हेल्थ डेस्क, मुस्कान कुमारी।

ब्रिटेन। ब्रिटेन के सबसे युवा डिमेंशिया पीड़ित आंद्रे यारहम की 24 साल की उम्र में मौत हो गई, जिनका दिमाग एमआरआई स्कैन में 70 साल के बुजुर्ग जैसा दिखा। उनके परिवार ने उनका ब्रेन रिसर्च के लिए दान कर दिया, ताकि इस दुर्लभ बीमारी की वजहों का पता लग सके।

दुर्लभ बीमारी का शिकार बना युवा

आंद्रे यारहम की कहानी दिल दहला देने वाली है। 2022 में लक्षण दिखने शुरू हुए थे, जब वह कभी-कभी चीजें भूल जाते या चेहरे पर खाली-खाली भाव आ जाते। परिवार ने बताया कि शुरुआत में यह छोटी-मोटी भूलने की आदत लगी, लेकिन जल्द ही स्थिति बिगड़ गई। 23वें जन्मदिन से ठीक पहले उन्हें फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (एफटीडी) का डायग्नोसिस मिला, जो डिमेंशिया का एक दुर्लभ रूप है।

एमआरआई स्कैन ने चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई: उनका दिमाग दशकों पुराना लग रहा था। डॉक्टरों के मुताबिक, सामान्य 24 साल के दिमाग में जहां विकास की प्रक्रिया जारी रहती है, वहां आंद्रे के ब्रेन में भारी सिकुड़न थी। यह बीमारी आमतौर पर बुढ़ापे में होती है, लेकिन आंद्रे का केस असाधारण था। मौत से पहले वह बोलने की क्षमता खो चुके थे, खुद की देखभाल नहीं कर पाते थे और व्हीलचेयर पर निर्भर थे। कभी-कभी उनका व्यवहार असामान्य हो जाता, जो परिवार के लिए बेहद दर्दनाक था।

फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया: व्यक्तित्व और भाषा पर हमला

डिमेंशिया के इस रूप में अल्जाइमर से अलग, याददाश्त पहले प्रभावित नहीं होती। यह ब्रेन के फ्रंटल और टेम्पोरल लोब्स पर असर डालती है, जो व्यक्तित्व, व्यवहार और भाषा को नियंत्रित करते हैं। मरीजों में आवेग बढ़ जाते हैं, वे बोलने या समझने में असमर्थ हो जाते हैं। डिमेंशिया यूके के अनुसार, यह डिमेंशिया के कुल मामलों का सिर्फ एक प्रतिशत है, लेकिन युवाओं में यह और भी दुर्लभ है।

आंद्रे के मामले में जेनेटिक फैक्टर मजबूत था। कुछ जीन म्यूटेशन से ब्रेन सेल्स में प्रोटीन जमा हो जाते हैं, जो न्यूरॉन्स को काम करने से रोकते हैं। समय के साथ ये सेल्स मर जाते हैं और ब्रेन टिशू सिकुड़ जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मजबूत जेनेटिक म्यूटेशन से बीमारी जल्दी शुरू हो सकती है, बिना दशकों इंतजार किए। सामान्य उम्रदराजी में ब्रेन धीरे-धीरे बदलता है, लेकिन यहां पूरा नेटवर्क तेजी से ढह जाता है।

मौत के बाद रिसर्च की उम्मीद

क्रिसमस के दौरान आंद्रे की मौत हुई। परिवार ने फैसला लिया कि उनका ब्रेन डोनेट करेंगे। यह फैसला भावुक लेकिन साहसिक था। मां सामंथा फेयरबर्न ने कहा, "यह सबसे क्रूर बीमारी है, जिसे किसी पर नहीं चाहूंगी।" ब्रेन डोनेशन से वैज्ञानिक सेल्स और प्रोटीन स्तर पर जांच कर सकेंगे कि युवा दिमाग में यह कैसे हुआ।

डिमेंशिया का कोई इलाज नहीं है। लक्षण शुरू होने के बाद इसे रोकना मुश्किल है, और दवाएं सिर्फ धीमा कर सकती हैं। युवा मामलों की दुर्लभता से रिसर्च सीमित है। आंद्रे का ब्रेन उन रहस्यों को खोल सकता है, जैसे किन प्रोटीन्स ने क्लंप बनाए, किन सेल्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ा और इम्यून सिस्टम की क्या भूमिका थी। यह जानकारी भविष्य में दवाओं और रोकथाम के लिए जरूरी है।

युवा डिमेंशिया की चुनौतियां

आंद्रे की मौत याद दिलाती है कि डिमेंशिया सिर्फ बुढ़ापे की बीमारी नहीं। दुनिया भर में 30-64 साल के बीच युवा-ऑनसेट डिमेंशिया के 92 मामले प्रति एक लाख लोगों में होते हैं, लेकिन 25 साल से कम उम्र में यह बेहद दुर्लभ है। 2022 के एक अध्ययन में 25 साल से कम उम्र के एफटीडी के सिर्फ दो दर्जन मामले दर्ज हैं। सबसे कम उम्र का केस 14 साल का था।

परिवार की देखभाल की कहानी भी प्रेरक है। आंद्रे को नॉरफॉक एंड नॉरविच यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में स्कैन हुआ, फिर कैम्ब्रिज के एडेनब्रूक्स हॉस्पिटल में डायग्नोसिस। आखिरी दिन प्रिसिला बेकन लॉज होस्पिस में गुजरे। परिवार ने कैरर्स और मेडिकल टीम को धन्यवाद दिया।

रिसर्च में योगदान की संभावनाएं

ब्रेन डोनेशन से न्यूरोसाइंटिस्ट्स को फाइन डिटेल्स मिलेंगी। ब्रेन स्कैन से खोए हिस्सों का पता चलता है, लेकिन टिशू से 'क्यों' का जवाब मिलता है। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड के शोधकर्ता राहुल सिद्धू कहते हैं, "हम अभी समझना शुरू कर रहे हैं कि कुछ दिमाग जन्म से ही कमजोर क्यों होते हैं।" ऐसे दुर्लभ केस से निवेश और डोनेशन की जरूरत पर जोर पड़ता है।

आंद्रे की मौत दुखद है, लेकिन उनका ब्रेन हजारों जिंदगियों को बचा सकता है। यह केस बताता है कि डिमेंशिया कई रूपों में आती है और उम्र की सीमा नहीं मानती। रिसर्च जारी रहेगी, ताकि ऐसे मामले दोबारा न हों।