विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
लंदन। ब्रिटेन ने गुलामों के व्यापार में अपनी ऐतिहासिक भूमिका को लेकर भारत समेत 56 देशों से औपचारिक माफी मांगने की इच्छा जताई है। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने इसके लिए किसी भी तरह का आर्थिक मुआवजा देने से इनकार कर दिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने कहा कि उनकी सरकार गुलामों के व्यापार में ब्रिटेन की ऐतिहासिक भूमिका के लिए औपचारिक माफी मांगने को तैयार है।उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करने और उनके लिए खेद जताने की इच्छा है, लेकिन आर्थिक मुआवजे का कोई प्रस्ताव नहीं दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री का यह बयान अगले सप्ताह एंटीगुआ और बारबुडा में होने वाली राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक से पहले सामने आया है। लंबे समय से मांग की जा रही है कि ब्रिटेन गुलामी और औपनिवेशिक शासन के दौरान किए गए शोषण के लिए प्रभावित देशों से औपचारिक रूप से माफी मांगे और उन्हें मुआवजा दे। भारत समेत 56 देश इस मांग से जुड़े हैं। ब्रिटेन की भूमिका को लेकर यह मुद्दा कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
ब्रिटेन ने अपने औपनिवेशिक शासन के दौरान लगभग 30 लाख अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका स्थित अपने उपनिवेशों में भेजा था। वहां इन लोगों से बागानों में जबरन काम कराया जाता था। ब्रिटेन ने 1807 में अपने साम्राज्य में गुलामों के व्यापार को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद 1833 में गुलामी को कानूनी रूप से पूरी तरह खत्म कर दिया गया, हालांकि सभी गुलामों को वास्तविक आजादी मिलने में 1838 तक का समय लगा। खास बात यह है कि 1833 में ब्रिटिश सरकार ने गुलामों के मालिकों को कुल 2 करोड़ पाउंड का मुआवजा दिया था। उस समय यह रकम ब्रिटेन सरकार के सालाना बजट का लगभग 40 प्रतिशत थी।
गुलामी की प्रथा समाप्त होने के बाद 1838 से 1917 के बीच ब्रिटिश उपनिवेशों में अनुबंधित श्रम व्यवस्था का विस्तार हुआ। इसके तहत भारत से लगभग 20 लाख पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में काम करने के लिए भेजा गया। इनमें कैरेबियाई क्षेत्र से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक के इलाके शामिल थे, जहां भारतीय मजदूरों से मुख्य रूप से बागानों में काम कराया जाता था। इस व्यवस्था के तहत बड़ी संख्या में मजदूरों का शोषण हुआ और उन्हें काम की वास्तविक परिस्थितियों तथा अनुबंध की शर्तों के बारे में सही जानकारी नहीं दी गई। कुछ लोगों का अपहरण करके उन्हें जबरन दूसरे देशों में ले जाया गया और उनकी तस्करी तक की गई। खराब परिस्थितियों और आर्थिक मजबूरियों के कारण इनमें से ज्यादातर मजदूरों के लिए भारत वापस लौटना भी संभव नहीं हो पाया।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने लंबे समय से यह विचार रखा है कि ब्रिटेन की ओर से दिया जाने वाला कोई भी आर्थिक मुआवजा ऐतिहासिक नुकसान की भरपाई के लिए न तो पर्याप्त होगा और न ही स्वीकार्य। हालांकि, उनके अनुसार औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए विनाश और अत्याचारों के लिए नैतिक प्रायश्चित बेहद जरूरी है। थरूर ने गुलामों के व्यापार में ब्रिटेन की भूमिका के लिए औपचारिक माफी मांगने की प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम की इच्छा का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने गुलामी के लिए माफी की बात तो कही, लेकिन व्यापक औपनिवेशिक शासन और उसके दौरान हुए नुकसान के लिए माफी मांगने की इच्छा नहीं जताई।







