विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
नयी दिल्ली, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत रणनीतिक साझेदारी बताते हुए स्पष्ट किया है कि जिस तरह अमेरिका अपनी विदेश नीति में ‘अमेरिका फर्स्ट’ को प्राथमिकता देता है, उसी प्रकार भारत भी ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के तहत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च मानता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ द्विपक्षीय वार्ता के बाद संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग साझा हितों और समान चुनौतियों पर आधारित है, लेकिन प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच राजनीतिक समझ, रणनीतिक सहयोग, तकनीक, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में संबंध लगातार मजबूत हुए हैं।
विदेश मंत्री ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की प्राथमिकता हमेशा ऐसे ऊर्जा स्रोतों को चुनने की रही है जो बड़े, भरोसेमंद और अपेक्षाकृत सस्ते हों। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे देश के करोड़ों नागरिकों की जरूरतों से जुड़ी हुई है, इसलिए ऊर्जा आपूर्ति के विकल्पों में विविधता बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है, लेकिन भारत अन्य देशों के साथ भी सहयोग जारी रखेगा ताकि ऊर्जा उपलब्धता और कीमतों में संतुलन बना रहे। उनका कहना था कि अंततः सरकार की जिम्मेदारी नागरिकों को सुलभ और किफायती दरों पर ऊर्जा उपलब्ध कराना है।
एस. जयशंकर ने कहा कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिसके अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ समान रूप से मजबूत संबंध हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक तनावपूर्ण परिस्थितियों में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन सभी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक धुरी पर निर्भर रहने के बजाय बहुपक्षीय संबंधों को प्राथमिकता देता है और यही उसकी विदेश नीति की प्रमुख विशेषता रही है। उन्होंने यह भी कहा कि संवेदनशील क्षेत्रों में भारत संतुलन, संवाद और स्थिरता को बढ़ावा देने के पक्ष में है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री व्यापार मार्गों में संभावित व्यवधान के संबंध में विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और अमेरिका दोनों ही सुरक्षित तथा निर्बाध समुद्री व्यापार के समर्थक हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजारों में ऊर्जा कीमतों को स्थिर बनाए रखने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुचारू रखने के लिए समुद्री मार्गों का खुला और सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि भारत किसी भी प्रकार की ऐसी बाधा के खिलाफ है जिससे वैश्विक व्यापार या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी है।
आतंकवाद को भारत और अमेरिका के बीच साझा चुनौती बताते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत की नीति पूरी तरह शून्य सहिष्णुता पर आधारित है। उन्होंने दोनों देशों की सुरक्षा और जांच एजेंसियों के बीच बढ़ते सहयोग की सराहना की और कहा कि पिछले वर्ष 26/11 मुंबई हमलों के एक प्रमुख साजिशकर्ता के भारत प्रत्यर्पण को इस सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है और इस दिशा में भारत-अमेरिका सहयोग भविष्य में और मजबूत हो सकता है। साथ ही उन्होंने अमेरिकी वीजा नीति का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वैध यात्रियों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना नहीं करना चाहिए क्योंकि लोगों के बीच संपर्क, व्यापार, अनुसंधान और तकनीकी सहयोग दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार है।
वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत-अमेरिका संबंधों में खटास की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंधों की गति में कोई कमी नहीं आई है। उन्होंने कहा कि व्यापार असंतुलन को लेकर अमेरिकी प्रशासन विभिन्न देशों के साथ चर्चा कर रहा है और इसी प्रक्रिया के तहत भारत के साथ भी बातचीत जारी है। उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच ऐसा व्यापार समझौता संभव है जो दीर्घकालिक, संतुलित और दोनों पक्षों के लिए लाभकारी होगा। उन्होंने संकेत दिया कि इस दिशा में वार्ताओं में पर्याप्त प्रगति हुई है और निकट भविष्य में सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। ईरान से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि मौजूदा वार्ताओं में प्रगति हो रही है और जल्द सकारात्मक खबर मिलने की संभावना है, हालांकि उन्होंने इस पर अधिक टिप्पणी करने से इनकार किया।







