नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
मुंबई। महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अनिवार्य हिंदी भाषा परीक्षा की व्यवस्था खत्म कर दी है। इसके साथ ही 1976 और 1981 से लागू उन पुराने सरकारी आदेशों को भी रद्द कर दिया गया है, जिनके तहत कुछ कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा पास करना जरूरी था। नए फैसले के बाद अब सरकारी नौकरी में वेतन वृद्धि और पदोन्नति के लिए हिंदी परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता नहीं रहेगी।
यह मामला जून 2026 में सामने आया था, जब भाषा संचालनालय ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की थी। परीक्षा के लिए 28 जून की तारीख तय की गई थी। घोषणा के बाद ही महाराष्ट्र में इसका विरोध शुरू हो गया। राजनीतिक दलों के साथ-साथ मराठी भाषा से जुड़े कई संगठनों ने भी सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए हिंदी परीक्षा की जरूरत पर आपत्ति जताई थी।
हिंदी परीक्षा के विरोध में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने भी कड़ा रुख अपनाया था। पार्टी नेता संदीप देशपांडे ने इसे केंद्र के इशारे पर हिंदी थोपने की कोशिश बताया था। पार्टी ने चेतावनी दी थी कि यदि 28 जून को परीक्षा आयोजित की गई तो उसके कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों पर प्रदर्शन करेंगे। साथ ही यह भी कहा गया था कि प्रदर्शन के दौरान अगर कानून-व्यवस्था से जुड़ी कोई स्थिति बनती है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।
उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधा था। पार्टी की ओर से सवाल उठाया गया था कि जब मराठी को हाल ही में शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला है, तो महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा अनिवार्य करने की जरूरत क्यों है। पार्टी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या गुजरात या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के लिए इसी तरह हिंदी परीक्षा अनिवार्य की जाती है।
मराठी भाषा से जुड़े संगठनों और भाषा विशेषज्ञों ने भी सरकार के फैसले पर नाराजगी जताई थी। मराठी अभ्यास केंद्र से जुड़े भाषाविदों और कार्यकर्ताओं ने कहा था कि सरकार को अमराठी अधिकारियों और कर्मचारियों को मराठी भाषा सिखाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। उनका तर्क था कि सरकारी संसाधनों और कर्मचारियों का समय हिंदी परीक्षा की व्यवस्था में लगाने के बजाय महाराष्ट्र में प्रशासनिक कामकाज के लिए मराठी के इस्तेमाल और उसके ज्ञान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
सरकार के नए आदेश में 1976 और 1981 से लागू उन सभी संबंधित सरकारी प्रस्तावों और आदेशों को समाप्त कर दिया गया है, जिनके आधार पर हिंदी परीक्षा की व्यवस्था चल रही थी। यह फैसला 7 मई 2026 से प्रभावी माना गया है। इससे पहले जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने दसवीं कक्षा तक हिंदी की पढ़ाई नहीं की थी, उन्हें नौकरी के दौरान हिंदी परीक्षा पास करनी पड़ती थी। परीक्षा में सफल नहीं होने की स्थिति में उनके वेतन में होने वाली वृद्धि या पदोन्नति प्रभावित हो सकती थी।
अब इस बाध्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। यानी सरकारी कर्मचारियों को इंक्रीमेंट या प्रमोशन के लिए अलग से हिंदी भाषा परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। सरकार का तर्क है कि महाराष्ट्र में प्रशासनिक कामकाज की प्रमुख भाषा मराठी है, जबकि दूसरे राज्यों के साथ ही आधिकारिक पत्राचार के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में अलग से हिंदी परीक्षा अनिवार्य करने का औचित्य नहीं रह जाता। करीब पांच दशक पुरानी इस व्यवस्था के खत्म होने के साथ महाराष्ट्र में भाषा और मराठी अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।







