लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मृत्यु भी जन्म की तरह शाश्वत सत्य है।जो इस पृथ्वी पर आया है,जन्मा है वो मरेगा जरूर।
मरने के बाद कल्पनारूपी स्वर्ग-नरक के दरवाजों में प्रवेश करना पड़ता है।पुनर्जन्म का, नयी काया धारण करते रहने का सिलसिला चलता रहता है। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। इस सच्चाई को भी सभी भली भांति जानते और स्वीकारते हैं कि भले बुरे कर्मों का फल यदि इसी जन्म में न भुगता गया हो तो वह अगले जन्म में प्रकट एवं फलित होता है। आश्चर्य तो तब होता जब इस कड़वी सच्चाई को लोग गंभीरता से नहीं देखते और उस महायज्ञ की पूर्व तैयारी इस प्रकार नहीं करते जैसी कि उन्हें करनी चाहिए।प्रायः लोग सोचते कि अन्य लोग ही मरेंगे।हमारे सामने यह भयंकर स्थिति नहीं आएगी जिसमें संसार छोड़ना पड़े,संसार से बिछुड़ना पड़े और अनिश्चितता के धरातल पर हवा में तैरते रहना पड़े। उपेक्षाएँ सभी बुरी होती हैं।
विस्मरण को भारी कमी माना जाता है,पर मृत्यु को भूल जाने का तो ऐसा दुष्परिणाम सामने आता है जिसकी क्षतिपूर्ति आगे चल कर भी कभी पूरी नहीं हो सकती। जीवन एक अनुपम सुयोग है। सृष्टि के अन्य प्राणियों में किसी की भी शारीरिक संरचना और मानसिक संगठना ऐसी उच्चकोटि की नहीं है।ईश्वर भी स्वयं अपनी इस संरचना पर अपने मन में लालच रखते और इसी के साथ जुड़े रहने में प्रसन्नता अनुभव करते। इस धारा पर जीवित प्राणियों में मनुष्य की स्थिति सर्वोत्तम है और इस योग्य है कि महान उपलब्धि के अनुरूप अपनी कृतियों को भी ऐसी बना सके जिसे अभिनंदनीय कहा जा सके,जिसे देख कर लोग अनुकरणीय और अभिवंदनीय कहें,उससे प्रेरणा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।मौत की चर्चा परिचर्चा को सामान्यतः बुरा माना जाता,ऐसे कथन को अशुभ माना जाता,किसी के सम्मुख उसके मरण की कामना भर कर देना गाली देने से भी बुरा माना जाता है।मृत्यु हर घड़ी सिर पर सवार रहे,यह बुरा है।
पर यह उससे भी बुरा है कि उसे एक प्रकार से विस्मृत ही कर दिया जाए।भुला देने पर मनुष्य अहंकारी हो जाता है।उद्दंडता और दुष्टता करने लगता है।मृत्यु का कोई समय निश्चित नहीं,वो बड़े छोटे का भेद नहीं करती,ऐसी दशा में भावुक या यथार्थवादी किसी भी समय मौत के आगमन की प्रतीक्षा करते देखे जाते हैं।मृत्यु को अपनी सत्ता का अंत न माना जाए अपितु आत्मा को अमर माना जाए और मरण को पुराने कपड़े से नए कपड़े बदलने जैसा माना जाए।इसके फलस्वरूप दूरदर्शिता का उदय होता है।







