रुपये को गिरने से बचाने के लिए RBI ने उठाया बड़ा कदम, डॉलर बेचकर बाजार को संभालने की कोशिश
नेशनल डेस्क, शुभम कुमार तिवारी।
नई दिल्ली। भारतीय रुपये की लगातार गिरती कीमत को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े स्तर पर हस्तक्षेप किया है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने 8 जून से अब तक डॉलर बेचने और करेंसी स्वैप के जरिए करीब 75 से 80 अरब डॉलर के हस्तक्षेप का अनुमानित स्तर हासिल किया है। इसका मकसद रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करना और बाजार में डॉलर की उपलब्धता बनाए रखना है।
रुपये की कीमत में गिरावट का असर केवल शेयर बाजार या बैंकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर रुपये की कीमत क्यों गिर रही है, RBI डॉलर क्यों बेच रहा है और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?
RBI डॉलर क्यों बेच रहा है?
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है और उसकी उपलब्धता कम होती है, तो डॉलर महंगा होने लगता है। इसका असर भारतीय रुपये पर पड़ता है और रुपया कमजोर हो सकता है।
ऐसी स्थिति में RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है। इससे बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, भारत को विदेशों से कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और कई जरूरी चीजें खरीदनी पड़ती हैं। इनका भुगतान अक्सर डॉलर में किया जाता है। अगर डॉलर महंगा हो जाता है, तो भारत को उतना ही सामान खरीदने के लिए पहले से ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इसलिए RBI रुपये में अचानक होने वाली गिरावट को रोकने की कोशिश करता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि RBI रुपये की कीमत को हमेशा एक ही स्तर पर बनाए रखना चाहता है। उसका मुख्य उद्देश्य बाजार में अचानक होने वाले बड़े उतार-चढ़ाव को कम करना है।
विदेशी मुद्रा भंडार में क्यों आ रही है कमी?
भारत के पास विदेशी मुद्रा का एक बड़ा भंडार है, जिसमें डॉलर और दूसरी विदेशी परिसंपत्तियां शामिल हैं। जरूरत पड़ने पर RBI इसी भंडार का इस्तेमाल रुपये को सहारा देने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए कर सकता है।
Reuters की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, 2 अक्टूबर तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 734.6 अरब डॉलर था। यह सितंबर के पहले सप्ताह में दर्ज लगभग 785 अरब डॉलर के स्तर से करीब 51 अरब डॉलर कम था।
इसके बाद 9 अक्टूबर तक विदेशी मुद्रा भंडार घटकर करीब 726.027 अरब डॉलर रह गया। इस गिरावट के पीछे रुपये को संभालने के लिए डॉलर की बिक्री के साथ-साथ विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्य में बदलाव जैसे दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में आई पूरी गिरावट को केवल RBI की डॉलर बिक्री का परिणाम मानना सही नहीं होगा।
रुपये की कीमत गिरने के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?
1. कच्चे तेल की कीमतें
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को उसे खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
2. विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना
जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकालते हैं, तो वे अपनी रकम को डॉलर या दूसरी मुद्राओं में बदल सकते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये की कीमत पर असर पड़ सकता है।
3. डॉलर का मजबूत होना
अमेरिकी अर्थव्यवस्था, ब्याज दरों और वैश्विक परिस्थितियों के कारण जब डॉलर मजबूत होता है, तो भारतीय रुपये समेत कई दूसरी मुद्राओं पर दबाव पड़ सकता है।
4. बाजार में अनिश्चितता
जब निवेशकों को भविष्य की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता होती है, तो वे सुरक्षित माने जाने वाले निवेश की ओर रुख कर सकते हैं। इससे भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
RBI ने रुपये को संभालने के लिए और क्या कदम उठाए?
डॉलर बेचने के अलावा RBI ने डॉलर की मांग को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठाए हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, डॉलर की खरीद से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव और करेंसी स्वैप जैसे उपायों का भी इस्तेमाल किया गया है।
इन कदमों का उद्देश्य खुले बाजार में डॉलर की मांग को कम करना और रुपये में होने वाली तेज गिरावट को रोकने में मदद करना है।
हालांकि, इन उपायों का असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की स्थिति कैसी रहती है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में कितना पैसा लगाते हैं।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
रुपये की कीमत गिरने का असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ सकता है। अगर डॉलर महंगा होता है, तो विदेशों से आने वाली कई चीजों की लागत बढ़ सकती है।
- पेट्रोल और डीजल: कच्चा तेल महंगा होने और डॉलर की कीमत बढ़ने से तेल आयात की लागत बढ़ सकती है।
- मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामान: विदेशों से आने वाले मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे उपकरण महंगे हो सकते हैं।
- विदेश में पढ़ाई: विदेश में फीस और रहने का खर्च चुकाने के लिए परिवारों को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
- विदेश यात्रा: डॉलर में होने वाले खर्च रुपये में महंगे पड़ सकते हैं।
- महंगाई: आयात की लागत बढ़ने पर कंपनियों के उत्पादन और परिवहन खर्च में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
हालांकि, रुपये की कमजोरी का असर हर क्षेत्र पर एक जैसा नहीं होता। कुछ निर्यात करने वाली कंपनियों को डॉलर में होने वाली कमाई के बदले ज्यादा रुपये मिल सकते हैं।
क्या विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट चिंता की बात है?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के लिए आर्थिक सुरक्षा की तरह काम करता है। जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल आयात के भुगतान और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए किया जा सकता है।
अगर रुपये को संभालने के लिए लंबे समय तक बड़ी मात्रा में डॉलर बेचने पड़ते हैं, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन केवल भंडार में गिरावट देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि देश की अर्थव्यवस्था संकट में है। इसके लिए विदेशी कर्ज, आयात की जरूरत, विदेशी निवेश और RBI की दूसरी वित्तीय स्थितियों को भी देखना जरूरी है।
आगे रुपये की चाल किस पर निर्भर करेगी?
आने वाले दिनों में रुपये की स्थिति काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के फैसलों और RBI के कदमों पर निर्भर करेगी।
अगर डॉलर की मांग कम होती है और विदेशी निवेश का प्रवाह बेहतर होता है, तो रुपये को सहारा मिल सकता है। लेकिन अगर तेल महंगा बना रहता है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते रहते हैं, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
फिलहाल, RBI की कोशिश बाजार में स्थिरता बनाए रखने और रुपये में अचानक होने वाली तेज गिरावट को सीमित करने की है।






