स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना।
विधायक सतीश उपाध्याय ने विश्वविद्यालय परिवार को बताया सनातन संस्कृति का संरक्षक, कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने वैदिक परंपराओं को जीवन-मूल्यों से जोड़ने पर दिया बल
नई दिल्ली: श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वेद-वेदाङ्ग पीठ के पौरोहित्य विभाग के तत्वावधान में शुक्रवार को श्रावणी-उपाकर्म समारोह का गरिमापूर्ण आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय परिसर स्थित देवसदन (छठपूजास्थल) में वैदिक विधि-विधान, मंत्रोच्चार एवं धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न हुए इस समारोह में सनातन वैदिक परंपरा, ऋषि-संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया।
समारोह में दिल्ली के विधायक श्री सतीश उपाध्याय मुख्य रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने वैदिक विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन में सहभागिता की तथा विश्वविद्यालय परिवार को सनातन संस्कृति एवं वैदिक परंपरा का महत्वपूर्ण संरक्षक बताते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल शिक्षा और शोध के केंद्र नहीं हैं, बल्कि भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, संस्कृति और संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित एवं संवर्धित करने वाले महत्वपूर्ण संस्थान हैं। उन्होंने कहा कि श्रावणी उपाकर्म जैसे संस्कार हमारी प्राचीन परंपराओं को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय संस्कृति एवं वैदिक परंपराओं के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने अपने संबोधन में कहा कि श्रावणी उपाकर्म भारतीय वैदिक परंपरा का अत्यंत पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण संस्कार है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मानुशासन, ऋषि-ऋण के स्मरण तथा ज्ञान-साधना के प्रति पुनः संकल्प का अवसर है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा की जीवनदृष्टि में संस्कारों का विशेष स्थान है और विश्वविद्यालय का दायित्व है कि वह इन परंपराओं को शास्त्रीय आधार के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाए। उन्होंने कहा कि वैदिक ज्ञान और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों को समकालीन जीवन से जोड़कर ही भारतीय ज्ञान-परंपरा को अधिक व्यापक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में श्रावणी उपाकर्म की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कारों, वैदिक जीवन-पद्धति एवं अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण के साथ-साथ उसके वैज्ञानिक, शास्त्रीय एवं व्यावहारिक पक्ष को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
पौरोहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. रामराज उपाध्याय ने श्रावणी उपाकर्म की शास्त्रीय पृष्ठभूमि एवं वैदिक महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपाकर्म ज्ञान-साधना के पुनर्संकल्प, आत्मशुद्धि और ऋषि-परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशिष्ट अवसर है। उन्होंने वैदिक परंपरा में वर्णित विधि-विधान के अनुरूप समारोह के विभिन्न अनुष्ठानों का संचालन एवं मार्गदर्शन किया।
समारोह में विश्वविद्यालय के आचार्यगण, अधिकारीगण, विद्यार्थी एवं अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे। इस अवसर पर प्रो. जयकांत सिंह शर्मा, पूर्व वेद-वेदाङ्ग पीठ प्रमुख प्रो. रामानुज उपाध्याय, प्रो. देवेंद्र प्रसाद मिश्र, प्रो. सुन्दर नारायण झा, प्रो. रामसलाही द्विवेदी, प्रो. वृंदावन दास, प्रो. हनुमान मिश्र, डॉ. ओंकार यशवंत सेल्यूकर, डॉ. मधुसूदन शर्मा, डॉ. रविंद्र पांडा, डॉ. नितेश झा, हर्षित अग्निहोत्री एवं शिवम दुबे सहित विश्वविद्यालय परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
समारोह की समस्त व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित एवं सफल बनाने में अंजनी राय की विशेष भूमिका रही। उनके समन्वय एवं सक्रिय सहयोग से कार्यक्रम की व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संपन्न हुईं।
श्रावणी-उपाकर्म समारोह ने विश्वविद्यालय परिसर में वैदिक मंत्रों, संस्कारों और सनातन परंपरा की जीवंत अनुभूति कराते हुए भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त किया।







