लोकल डेस्क, मुस्कान सिंह।
रक्सौल । किसी भी समाज की वास्तविक सुंदरता एक जैसी सोच रखने वाले लोगों से नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करने वाले लोगों से बनती है। हर व्यक्ति का अपना अनुभव, नजरिया और समझ होती है। ऐसे में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी सोच को ही अंतिम सत्य मानने लगता है और दूसरों के विचारों को सुनने से इनकार कर देता है, तब संवाद की जगह टकराव और समझदारी की जगह अहंकार ले लेता है।
वास्तव में असहमति किसी भी जागरूक और जीवंत समाज की पहचान है। जहां लोग सवाल पूछते हैं, गलतियों की ओर ध्यान दिलाते हैं और व्यवस्था में सुधार की मांग करते हैं, वहां जागरूकता का वातावरण बनता है। असहमति का अर्थ किसी का अपमान करना या व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना है। सहमति से रास्ते आसान होते हैं, लेकिन असहमति से नए रास्तों की खोज होती है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया में अनेक बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तब आए, जब लोगों ने प्रचलित मान्यताओं पर सवाल उठाने का साहस किया। यदि हर व्यक्ति पुरानी व्यवस्था को बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता, तो समाज में नई सोच और सुधार की संभावनाएं सीमित रह जातीं। इसलिए सवाल पूछने की प्रवृत्ति को दबाने के बजाय उसे सही दिशा देना जरूरी है।
लोकतंत्र में असहमति का महत्व और भी बढ़ जाता है। लोकतंत्र केवल बहुमत के आधार पर सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और शासन से जवाब मांगने का अधिकार भी देता है। विपक्ष की भूमिका, स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष आलोचना और जनता के सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। बहुमत की राय का सम्मान होना चाहिए, लेकिन अल्पमत की आवाज को भी उचित महत्व मिलना जरूरी है।
आज चिंता की बात यह है कि समाज में विचारों का अंतर धीरे-धीरे व्यक्तिगत दुश्मनी का रूप लेता जा रहा है। किसी की बात पसंद न आने पर उसे गलत ठहरा देना, उसकी नीयत पर सवाल उठाना या उसे विरोधी मान लेना एक गलत सामाजिक प्रवृत्ति बनती जा रही है। सोशल मीडिया ने भी कई बार इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जहां बिना पूरी बात समझे प्रतिक्रिया देने और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ लगी रहती है।
हमें समझना होगा कि किसी व्यक्ति के विचारों से असहमत होने का अर्थ उसके प्रति सम्मान समाप्त करना नहीं है। विचारों का विरोध कीजिए, व्यक्ति का अपमान नहीं। तर्क से जवाब दीजिए, कटु शब्दों से नहीं। अपनी बात मजबूती से रखिए, लेकिन दूसरों को भी अपनी बात कहने का अवसर दीजिए।
असहमति की भी अपनी मर्यादा होती है। विरोध के नाम पर हिंसा, तोड़फोड़, अपशब्द और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है। लोकतांत्रिक विरोध का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि समाज में भय और अव्यवस्था पैदा करना। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, तथ्यपूर्ण आलोचना और रचनात्मक सुझाव ही सकारात्मक बदलाव के वास्तविक माध्यम हैं।
आलोचना से घबराने वाला समाज ठहर जाता है, जबकि आलोचना को समझने और उससे सीखने वाला समाज आगे बढ़ता है। यह सिद्धांत केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। परिवार में बच्चों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। संगठनों में प्रत्येक सदस्य की राय सुनी जानी चाहिए और सामाजिक संस्थाओं में निर्णय सामूहिक विचार-विमर्श के आधार पर होने चाहिए। जब लोगों को लगता है कि उनकी बात का महत्व है, तब उनके भीतर जिम्मेदारी और अपनापन भी बढ़ता है।
किसी व्यक्ति की महानता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने लोग उससे सहमत हैं, बल्कि इस बात से पहचानी जानी चाहिए कि वह अपने विरोधी विचारों को कितने धैर्य और सम्मान के साथ सुनता है। जो व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखता है, वही वास्तव में सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता रखता है।
यह भी समझना जरूरी है कि हर आलोचना विरोध नहीं होती और हर प्रशंसा सच्चाई का प्रमाण नहीं होती। कभी-कभी असहमत होने वाला व्यक्ति भी हमारा सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित हो सकता है, क्योंकि वह हमारी उन कमियों को सामने लाता है, जिन्हें हम स्वयं नहीं देख पाते। इसलिए अपने भीतर सहनशीलता, विनम्रता और आत्ममंथन की भावना विकसित करनी चाहिए।
अंततः समाज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि वहां कितने लोग एक जैसी सोच रखते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग कितनी शालीनता और सम्मान के साथ एक साथ रह पाते हैं। हमें ऐसा समाज बनाना होगा, जहां सवाल पूछने वाले को विरोधी, आलोचना करने वाले को दुश्मन और असहमति रखने वाले को गलत न समझा जाए।
याद रखिए, जहां असहमति का सम्मान होता है, वहां विचारों का विकास होता है। विचारों के विकास से लोकतंत्र मजबूत होता है और मजबूत लोकतंत्र ही जागरूक, संवेदनशील एवं समृद्ध समाज के निर्माण का आधार बनता है।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई, जोन-41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन तथा भारत विकास परिषद, रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किए।







