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व्यर्थ की चिंता ही जीवन की प्रगति का अवरोध है : बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज |

रक्सौल/पूर्वी चंपारण : जिस इंसान को अपने जीवन में सुख-शांति की आकांक्षा है; जिसे उन्नति,विकास और सफलता की कामना है,उसे अपने सबसे घातक शत्रु 'चिंता' का त्याग कर देना चाहिए।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत विकास परिषद् ,रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

मनुष्य की जिस शक्ति पर उन्नति,विकास और सफलता निर्भर रहती है,उसे यह ' चिंता' की आग जलाकर भस्म कर देती है। असक्त व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार का श्रेय प्राप्त नहीं कर सकता। 'चिंता' के त्याग से मनुष्य की बची हुई शक्ति उसके बड़े काम आ सकती है। प्रायः इंसान चिंता का मूल कारण अपने जीवन के कोई-न-कोई अभाव को ही मानते हैं,जबकि चिंता और अभाव दो भिन्न बातें हैं।

अभाव की वेदना जहाँ क्रिया की प्रेरिका है, वहाँ चिंता मनुष्य को निष्क्रिय बना देती है।जिस अभाव की पूर्ति के बिना मनुष्य को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।उसकी पूर्ति के लिए वह अवश्य प्रयत्नशील होगा।किंतु चिंता एक ऐसा असाध्य रोग है, जो मनुष्य के समग्र जीवन को प्रभावित करके किसी काम का नहीं रखती।जो व्यग्रता अपने कारण को दूर करने के लिए क्रियाशील बनाए, वह उत्तरदायित्व की भावना ही है, चिंता नहीं। चिंता केवल उसी व्यग्रता को कहा जा सकता है, जो मनुष्य को अपने तक सीमित करके केवल सोचने और जलने के लिए मजबूर करे। जीवन एक प्रकाश पुंज है,आइए हम सभी मिल कर प्रकाश पर्व के अवसर पर नकारात्मक विचारों का दहन करें साथ ही सकारात्मक विचारों की ज्योति प्रकाशमान करें।