लोकल डेस्क, एन के सिंह।
जब पाकुड़ की धरती से गूंजी थी गोरी हुकूमत के अंत की ललकार। 16 जनवरी 1942 को पाकुड़ में आयोजित अधिवेशन में उन्होंने 300 भूमिहीन संथालियों को संगठित कर अपनी जमीनों पर पुन: कब्जे के लिए प्रेरित किया।
पूर्वी चंपारण: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नायक ऐसे हैं जिनकी वीरता की गाथाएं आज भी पहाड़ियों और जंगलों की हवाओं में तैरती हैं। आज डॉ. लंबोदर मुखर्जी की 124वीं जयंती है। यह उस महान क्रांतिकारी को याद करने का दिन है, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों की चूलें हिलाईं, बल्कि जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को आदिवासियों के आत्मसम्मान का प्रतीक बना दिया। 1930 के दशक के अंत तक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने संथाल परगना में फॉरवर्ड ब्लॉक की मशाल को थामने की जिम्मेदारी डॉ. लंबोदर मुखर्जी और उनकी धर्मपत्नी उषा रानी के हाथों में सौंप दी थी। यह उनकी संगठनात्मक शक्ति ही थी कि 1942 आते-आते उन्होंने 1200 से अधिक सशक्त आदिवासियों की एक ऐसी टोली तैयार कर ली थी, जो ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेने के लिए हर समय तत्पर थी।
पाकुड़ अधिवेशन: संघर्ष की एक ऐतिहासिक चिंगारी
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 16 जनवरी 1942 की वह तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जब पाकुड़ में फॉरवर्ड ब्लॉक का ऐतिहासिक अधिवेशन चल रहा था। सर्बानंद मिश्रा की गरिमामयी उपस्थिति में डॉ. लंबोदर मुखर्जी इस अधिवेशन का नेतृत्व कर रहे थे। उस समय वहां 300 ऐसे संथाली आदिवासी मौजूद थे, जिन्हें ब्रिटिश राज की क्रूर नीतियों ने बेघर कर दिया था। लगान न भर पाने के कारण उनकी पुश्तैनी जमीनें छीन ली गई थीं। मुखर्जी ने जब मंच से बोलना शुरू किया, तो उनके शब्दों में वह आग थी जिसने निराश संथालियों के भीतर फिर से अपनी जमीन पर अधिकार पाने का जोश भर दिया। उन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता को उजागर किया, बल्कि उस समय के कांग्रेस के नरम रुख की भी तीखी आलोचना की।
हुकूमत को चुनौती और 4 साल की जेल
डॉ. मुखर्जी का प्रभाव इतना गहरा था कि अधिवेशन के समापन पर पूरा पंडाल 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस अमर रहें' के जयकारों से गूंज उठा। उसी क्षण, लंबोदर मुखर्जी के नेतृत्व में उन 300 संथाली आदिवासियों ने फॉरवर्ड ब्लॉक की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस घटना ने ब्रिटिश प्रशासन की नींद उड़ा दी। भागलपुर के तत्कालीन कमिश्नर ने इसे सीधे तौर पर राजद्रोह माना और डॉ. मुखर्जी को तुरंत हिरासत में ले लिया गया। उन पर 'डिफेंस ऑफ इंडिया, रूल 26' के तहत मुकदमा चलाया गया। मार्च 1942 में उन्हें 4 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन जेल की दीवारें उनके हौसलों को पस्त नहीं कर सकीं।
आदिवासी अस्मिता के रक्षक
डॉ. लंबोदर मुखर्जी का जीवन केवल एक राजनीतिक नेता का नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक और संरक्षक का भी था। उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर उन्हें यह अहसास कराया कि अपनी जमीन पर उनका नैसर्गिक अधिकार है। उनके द्वारा तैयार किए गए 1200 स्वयंसेवकों ने आगे चलकर आजादी के आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उनकी 124वीं जयंती पर देश उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में नमन कर रहा है, जिन्होंने पाकुड़ की मिट्टी से उठी आवाज को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा और नेताजी के सपनों को संथाल परगना के सुदूर गांवों तक पहुंचाया।







