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सफलता की चमक दिखाई देती है, संघर्ष की तपिश नहीं: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: सफलता जीवन का ऐसा शब्द है, जिसका अर्थ हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है। किसी के लिए धन-संपत्ति अर्जित करना सफलता है, किसी के लिए पद, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि प्राप्त करना; जबकि किसी के लिए आत्मसंतोष, मानसिक शांति और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वास्तव में सफलता का मूल्य बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उस जीवन-यात्रा से तय होता है, जिसे तय करके व्यक्ति उस मुकाम तक पहुँचता है।

उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई (26-27) के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता  बिमल सर्राफ ने व्यक्त करते हुए कहा कि सफलता का वास्तविक स्वरूप हिमखंड के समान होता है। जिस प्रकार हिमखंड का केवल छोटा-सा भाग जल की सतह के ऊपर दिखाई देता है, जबकि उसका विशाल हिस्सा पानी के भीतर छिपा रहता है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति की सफलता का केवल चमकदार हिस्सा ही संसार को दिखाई देता है। उसके पीछे छिपा संघर्ष, त्याग, असफलताएँ, धैर्य, अनुशासन और वर्षों का परिश्रम सामान्यतः दिखाई नहीं देता।

हम अक्सर किसी सफल व्यक्ति को देखकर उसके वर्तमान से प्रभावित हो जाते हैं, लेकिन उसके अतीत में झाँकने का प्रयास नहीं करते। हमें उसका सम्मान, पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियाँ दिखाई देती हैं, किंतु उन उपलब्धियों तक पहुँचने के लिए उसने कितनी रातें जागकर बिताईं, कितनी कठिनाइयों का सामना किया, कितनी बार असफल होकर फिर उठ खड़ा हुआ और कितनी परिस्थितियों में स्वयं को संभाला—यह सब अदृश्य रह जाता है।

यही सफलता का सबसे बड़ा सत्य है कि उपलब्धि कुछ क्षणों में दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे की तैयारी वर्षों तक चलती है।

जीवन में हर व्यक्ति सफलता चाहता है, लेकिन सफलता की कीमत चुकाने के लिए हर व्यक्ति समान रूप से तैयार नहीं होता। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है। उसके लिए निरंतर परिश्रम, आत्मानुशासन, धैर्य, समय का सदुपयोग और अपने उद्देश्य के प्रति अटूट समर्पण आवश्यक है। जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता, वही धीरे-धीरे अपनी राह बनाता है।

सफलता को केवल धन, पद और प्रसिद्धि से जोड़ना भी उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति ने अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाया, समाज के लिए उपयोगी कार्य किया, किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा जगाई अथवा अपने भीतर संतोष और आत्मिक शांति प्राप्त की, तो यह भी सफलता का ही एक श्रेष्ठ रूप है। जीवन की वास्तविक सार्थकता केवल यह नहीं कि हमने कितना प्राप्त किया, बल्कि यह भी है कि हमने अपने जीवन से दूसरों के लिए कितना अच्छा किया।

भारतीय जीवन-दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरुषार्थ माना गया है। यह दृष्टिकोण बताता है कि जीवन की पूर्णता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि कर्तव्य, मर्यादा, संतुलन, आत्मविकास और अंततः आत्मिक शांति में निहित है। इसलिए सफलता का व्यापक अर्थ अपने जीवन को सार्थक बनाना है।

किसी सफल व्यक्ति की यात्रा को देखकर हमें उससे ईर्ष्या नहीं, बल्कि प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि जो उपलब्धि आज हमें सहज दिखाई दे रही है, उसके पीछे असंख्य अदृश्य प्रयास हो सकते हैं। एक पौधा जब वृक्ष बनकर फल देता है, तब लोग उसके फल देखते हैं; उसकी जड़ों का वर्षों तक धरती के भीतर फैलना दिखाई नहीं देता। सफलता भी ऐसी ही होती है—फल दिखाई देता है, जड़ें नहीं।

इसलिए जीवन में असफलता आने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। असफलता सफलता की राह में आने वाला वह अनुभव है, जो व्यक्ति को अपनी कमियों को पहचानने और स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर देता है। जो व्यक्ति असफलता से सीखकर दोबारा प्रयास करता है, वह वास्तव में सफलता की नींव मजबूत करता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि सफलता किसी एक दिन का चमत्कार नहीं, बल्कि लंबे समय तक किए गए छोटे-छोटे प्रयासों का परिणाम है। इसके शिखर पर पहुँचने वाला व्यक्ति ही जानता है कि उस ऊँचाई तक पहुँचने में कितनी कठिन चढ़ाई तय करनी पड़ी है।

सफलता की चमक संसार को दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे छिपा संघर्ष केवल सफल व्यक्ति ही जानता है। इसलिए किसी की उपलब्धि देखकर उसकी तुलना अपने जीवन से करने के बजाय उसके संघर्ष से प्रेरणा लें और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहें। यही सफलता की सच्ची राह है।