लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। जीवन की वास्तविक सुंदरता तब दिखाई देती है, जब हम अपने सुख के साथ दूसरों के सुख की भी चिंता करते हैं। समाज तभी मजबूत और शांतिपूर्ण बनता है, जब उसमें समानता, सम्मान और अपनापन हो। इसलिए कहा गया है; “समता अमृत है और विषमता विष।”
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई के जोनल चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
समता का अर्थ केवल धन-दौलत या अधिकारों की समानता नहीं है। समता का वास्तविक अर्थ है हर व्यक्ति को मनुष्य के रूप में समान सम्मान देना, किसी के साथ जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति या सामाजिक हैसियत के आधार पर भेदभाव न करना। जहाँ व्यक्ति को उसकी योग्यता और कर्म के आधार पर सम्मान मिलता है, वहाँ समाज में विश्वास और भाईचारा बढ़ता है।
इसके विपरीत, विषमता केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है। जब किसी व्यक्ति को दूसरे से छोटा समझा जाता है, किसी को अवसर से वंचित किया जाता है या किसी के साथ भेदभाव किया जाता है, तब विषमता जन्म लेती है। यही विषमता धीरे-धीरे समाज में दूरी, असंतोष, ईर्ष्या और संघर्ष को जन्म देती है।
आज दुनिया ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में बहुत प्रगति कर ली है। मनुष्य चाँद और मंगल तक पहुँचने की तैयारी कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। कहीं आर्थिक असमानता है, कहीं अवसरों की कमी है और कहीं पहचान के आधार पर भेदभाव। ऐसे समय में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल ऊँची इमारतें और आधुनिक सुविधाएँ नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ हर व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन जी सके।
समता का सबसे बड़ा आधार संवेदना है। यदि हम दूसरों के दुख को अपना दुख और उनकी खुशी को अपनी खुशी समझने लगें, तो समाज में बहुत-सी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन उसकी गरिमा और सम्मान समान हैं।
समता का अर्थ यह भी नहीं कि सभी लोग एक जैसे हों। प्रकृति ने हर व्यक्ति को अलग बनाया है। किसी में ज्ञान अधिक है, किसी में कला की प्रतिभा, कोई मेहनत में आगे है तो कोई नेतृत्व में। वास्तविक समता यह है कि अलग-अलग क्षमताओं के बावजूद सभी को आगे बढ़ने का उचित अवसर मिले।
परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक, हर स्तर पर समता की आवश्यकता है। परिवार में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव न हो, समाज में कमजोर और वंचित व्यक्ति को सम्मान मिले तथा राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो; यही स्वस्थ समाज की पहचान है।
हमें यह भी समझना होगा कि विषमता केवल दूसरों के कारण नहीं बढ़ती, बल्कि कई बार हमारी सोच भी उसे जन्म देती है। जब हम अपने से कमजोर व्यक्ति को छोटा समझते हैं और अपने से अधिक संपन्न व्यक्ति को बड़ा, तब हम अनजाने में असमानता को मजबूत करते हैं। इसलिए बदलाव की शुरुआत बाहर से नहीं, अपने विचारों और व्यवहार से करनी होगी।
आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर से भेदभाव की दीवारों को गिराएँ। किसी के पास कम है तो उसका मजाक न उड़ाएँ, किसी के पास अधिक है तो उससे ईर्ष्या न करें। जो आगे बढ़ चुका है, वह पीछे रह गए व्यक्ति का हाथ थामे और जो संघर्ष कर रहा है, उसे अवसर और प्रोत्साहन मिले। यही समता की सच्ची भावना है।
समाज में प्रेम, शांति और सहयोग तभी स्थायी हो सकते हैं, जब हम “मैं” से ऊपर उठकर “हम” की भावना को अपनाएँ। जहाँ समता होती है, वहाँ विश्वास पैदा होता है; जहाँ विश्वास होता है, वहाँ सहयोग बढ़ता है और जहाँ सहयोग होता है, वहाँ विकास की राह आसान हो जाती है।
इसलिए समता केवल एक सामाजिक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है। यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। इसके विपरीत विषमता समाज को बाँटती है और भीतर ही भीतर उसे कमजोर करती है। आइए, हम संकल्प लें कि किसी को उसकी स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से पहचानेंगे। अपने व्यवहार में समानता, विचारों में उदारता और जीवन में संवेदना को स्थान देंगे।
क्योंकि अंततः यही सत्य है; समता जहाँ अमृत बनकर जीवन को सींचती है, वहीं विषमता विष बनकर रिश्तों, समाज और मानवता को कमजोर करती है। इसलिए सुखी समाज का रास्ता समानता, सम्मान और संवेदना से होकर ही गुजरता है।






