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सर्वाइकल कैंसर: शुरुआती लक्षणों की अनदेखी से बढ़ता खतरा

स्टेट डेस्क, मुस्कान कुमारी।

पुणे। सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसरों में से एक है, लेकिन शुरुआती चरणों में यह बिना किसी लक्षण के विकसित होता है, जिससे निदान में देरी हो जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि नियमित स्क्रीनिंग ही इसका एकमात्र बचाव है।

'ठीक महसूस करना' क्यों बन जाता है जानलेवा जाल

सर्वाइकल कैंसर का खतरा महिलाओं के लिए गंभीर चुनौती है, खासकर जब यह चुपचाप बढ़ता है बिना किसी चेतावनी के। मातृत्व अस्पताल, पुणे की वरिष्ठ प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पद्मा श्रीवास्तव बताती हैं कि यह कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से, सर्विक्स में शुरू होता है, जो योनि से जुड़ता है। अधिकांश मामलों में यह धीरे-धीरे कई वर्षों में विकसित होता है। कैंसर से पहले असामान्य या पूर्व-कैंसरयुक्त कोशिकाएं बनने लगती हैं, जिन्हें पाप स्मीयर या एचपीवी टेस्ट जैसे स्क्रीनिंग परीक्षणों से जल्दी पकड़ा जा सकता है।

डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, "इस लंबे पूर्व-कैंसर चरण हमें महत्वपूर्ण अवसर देता है। नियमित जांच से असामान्य कोशिकाओं को कैंसर बनने से पहले ही पहचाना जा सकता है और समय पर हस्तक्षेप किया जा सकता है।" लेकिन समस्या यह है कि कई महिलाएं स्वस्थ महसूस करने पर चिकित्सा जांच टाल देती हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह धारणा खतरनाक है। "सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा खतरा यही है कि शुरुआती दौर में कोई चेतावनी संकेत नहीं दिखते। जब लक्षण प्रकट होते हैं, तब तक बीमारी उन्नत अवस्था में पहुंच चुकी होती है।"

एचपीवी संक्रमण: मुख्य वजह जो चुपके से हमला करता है

सर्वाइकल कैंसर का सबसे सामान्य कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) का लगातार संक्रमण है, जो यौन संचारित वायरस है। अधिकांश एचपीवी संक्रमण शरीर से खुद-ब-खुद साफ हो जाते हैं, लेकिन कुछ स्ट्रेन लंबे समय तक बने रहकर सर्विक्स की कोशिकाओं में असामान्य बदलाव लाते हैं। जोखिम कारक में जल्दी यौन गतिविधि शुरू करना, कई यौन साथी, धूम्रपान, खराब जननांग स्वच्छता, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और अनियमित स्क्रीनिंग शामिल हैं।

डॉ. श्रीवास्तव कहती हैं कि शुरुआती चरणों में यह कैंसर सामान्य शारीरिक कार्यों को प्रभावित नहीं करता। कोई दर्द या रक्तस्राव नहीं होता। लक्षण जैसे असामान्य योनि रक्तस्राव, दुर्गंधयुक्त स्राव, पेल्विक दर्द या संभोग के दौरान दर्द तब ही उभरते हैं जब कैंसर प्रगत हो चुका होता है। देर से निदान होने पर आक्रामक उपचार जैसे सर्जरी, विकिरण चिकित्सा और कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ती है। उन्नत सर्वाइकल कैंसर मूत्राशय, आंतों या फेफड़ों जैसे अंगों तक फैल सकता है, जिससे गंभीर जटिलताएं और जीवन की गुणवत्ता में कमी आती है।

स्क्रीनिंग और वैक्सीनेशन: बचाव की मजबूत ढाल

डॉ. श्रीवास्तव जोर देकर कहती हैं, "नियमित स्क्रीनिंग वैकल्पिक नहीं, बल्कि आवश्यक है।" चिकित्सा दिशानिर्देशों के मुताबिक, महिलाओं को 21 वर्ष की आयु से सर्वाइकल स्क्रीनिंग शुरू करनी चाहिए और डॉक्टर की सलाहानुसार अंतराल पर जांच करवानी चाहिए। जल्दी पता चलने पर उपचार सरल होता है, रिकवरी तेज और जीवित रहने की दर काफी ऊंची।

वैक्सीनेशन एक और महत्वपूर्ण उपकरण है। एचपीवी वैक्सीन उन वायरस स्ट्रेन के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है जो सर्वाइकल कैंसर से सबसे ज्यादा जुड़े हैं। यह अनुशंसित आयु में लेना सबसे प्रभावी होता है। डॉ. श्रीवास्तव कहती हैं, "वैक्सीन को लेकर भ्रांतियों को दूर करना जरूरी है।"

जागरूकता ही जीवन रक्षक: देरी का खामियाजा न भुगतें

सर्वाइकल कैंसर रोकथाम के तीन मुख्य स्तंभ हैं: नियमित स्क्रीनिंग, समय पर वैक्सीनेशन और जागरूकता। लक्षणों का इंतजार करना भारी कीमत चुकाने जैसा हो सकता है—सक्रिय देखभाल ही जीवन बचा सकती है। महिलाओं को अपनी सेहत पर ध्यान देना चाहिए, खासकर 30 वर्ष से ऊपर की उम्र में। पुणे जैसे शहरों में मातृत्व अस्पताल जैसे केंद्रों पर आसानी से जांच उपलब्ध है।