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सामाजिक उत्थान स्त्रियों की भागीदारी के बिना असंभव: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

वर्तमान काल एवं परिवेश में हमारा समाज मूलतः पुरुष प्रधान लोग मानते हैं जहाँ पुरुषों को स्त्रियों से अधिक मान-सम्मान और वर्चस्व का अधिकारी माना जाता है परंतु ऐसा नहीं है।

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता  बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।जिस समाज में पुरुषों को स्त्रियों से अधिक योग्य एवं सामर्थ्यशाली माना जाता है वह समाज कभी विकास नहीं कर सकता,क्योंकि इस समाज के संचालन हेतु पुरुष एक पक्ष है एवं शेष आधे पक्ष के महत्त्व एवं गरिमा को नकारा नहीं जा सकता है।

हम मनुष्य कैसे बने ? क्योंकि किसी स्त्री ने हमें अपने गर्भ में पाला एवं हमें जीवन प्रदान किया। हम असहाय होते यदि किसी माँ का सहारा हमें बचपन से न मिला होता।हम अपनी आधारभूत संरचना में स्त्री वर्ग पर निर्भर हैं।दूसरा कि हमको जो जन्म मिला है वह अपने श्रेष्ठ सुयोग को तभी प्राप्त करता है,जब जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी उन्नति की दिशा में कार्य करने की सोच पाते हैं।हम यह तभी कर पायेंगें,जब एक पुरुष प्रधान समाज में नारियों का सच्चा गौरव प्रकट होकर आए तथा उन्हें मानव जाति की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान देने का अवसर मिल सके।मानवता जहाँ  आज जिस मोड़ पर खड़ी है वहाँ से उसे एक ही चीज बचा सकती है,वह है नारियों का आगे आना एवं बढ़-चढ़कर अपनी प्रतिभा का परिचय देना।उन्हें विशेष किस अर्थ में बनाया गया है।

वे समाज की जननी ही नहीं इसकी निर्मात्री तथा वास्तविक शोभा भी हैं।स्त्रियों को दूसरों को एकजुट रखना तथा उनमें बल अभिवृद्धि प्रदान करने का विशेष गुण प्राप्त है। वे प्राकृतिक रूप से हमारे शरीरों का निर्माण करने वाली तो हैं ही, साथ ही वे मानव समाज की सच्ची सखा और मार्गदर्शक भी हैं।आज समाज के प्रत्येक को इस सकारात्मक सोच के साथ आगे आकर महिलाओं की सुनिश्चित भागीदारी का प्रयास करना चाहिए।अभी अधिकांश आधी आबादी का जो साथ समाज को मिलना चाहिए, उससे समाज वंचित है।अगर ये साथ मिल गया तो समाज की उन्नति को कोई नहीं रोक सकता है।