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स्कूल में हिजाब पहनने की इजाजत नहीं - इलाहाबाद हाईकोर्ट

स्टेट डेस्क, नीतीश कुमार।

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि स्कूल की तय यूनिफॉर्म का पालन जरूरी है। इससे बच्चों में बराबरी की भावना बनी रहती है और स्कूल की अपनी पहचान भी कायम रहती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यूनिफॉर्म की वजह से बिना धार्मिक भेदभाव वाला माहौल बना रहता है। ऐसे में कोई छात्र या छात्रा स्कूल के तय ड्रेस कोड में अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव की मांग नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

“स्कूल में व्यक्तिगत आधार पर हिजाब पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह यूनिफॉर्म के विचार के खिलाफ होगा। इससे स्कूल के अनुशासन को तय करने का अधिकार संस्थान के बजाय अलग-अलग छात्रों के हाथ में चला जाएगा।”

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिविजन बेंच ने नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी। छात्रा ने स्कूल के तय ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी।

कर्नाटक से शुरू हुआ था हिजाब विवाद

कर्नाटक में हिजाब विवाद जनवरी 2022 में उडुपी के एक सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ था। कुछ मुस्लिम छात्राओं ने हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की मांग की थी, जबकि कॉलेज प्रशासन ने इसे यूनिफॉर्म नियम के खिलाफ बताया था। इसके बाद विरोध दूसरे कॉलेजों तक पहुंचा और कुछ जगह भगवा शॉल पहनकर जवाबी प्रदर्शन भी हुए।

15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने छात्राओं की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और स्कूल के तय ड्रेस कोड का पालन कराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित

हिजाब विवाद पर 13 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच का फैसला एकमत नहीं था। दोनों जजों की राय अलग-अलग रही थी।

जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। उनके मुताबिक स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होता है और हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं किया गया।

वहीं, जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा था कि इस मामले में यह तय करना जरूरी नहीं है कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं। उनके मुताबिक छात्रा की आस्था और पसंद को अनुच्छेद 19 और 25 के तहत देखा जाना चाहिए।

अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी देता है। पहनावे को भी अभिव्यक्ति से जोड़कर अधिकार का दावा किया जा सकता है, लेकिन इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

अनुच्छेद 25 धर्म मानने और उसका पालन करने की आजादी देता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है।

इसके बाद मामले को सीजेआई की बेंच के पास भेजा गया था। हालांकि, करीब चार साल से इस पर सुनवाई नहीं हुई है।

प्रयागराज के निजी स्कूल की छात्रा ने दाखिल की थी याचिका

याचिका दाखिल करने वाली छात्रा प्रयागराज के एक निजी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ती है। उसने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6 से 10 तक हिजाब पहनकर ही स्कूल में पढ़ाई करती रही है और उस दौरान कभी कोई आपत्ति नहीं जताई गई। उसने याचिका के साथ पुराने पहचान पत्र और स्कूल की ग्रुप फोटो भी लगाई थी।

छात्रा ने कहा कि वह 11वीं कक्षा में भी हिजाब पहनकर स्कूल जाना चाहती है, लेकिन उसे इसकी अनुमति नहीं मिल रही। परिवार ने डीएम से भी शिकायत की थी, जिसके बाद जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ने रिपोर्ट मांगी।

स्कूल प्रिंसिपल ने कहा कि यह शिक्षा संस्थान है, जहां सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड है। किसी एक छात्रा को अलग छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित होगी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि हिजाब पहनना उसकी धार्मिक मान्यता से जुड़ा है। इसे पहनने से उसे निजता, व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं। ऐसे में स्कूल को उसे हिजाब पहनने से रोकने का निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए।

कोर्ट बोला- ड्रेस तय करने का अधिकार स्कूल प्रशासन के पास

कोर्ट ने कहा कि जब तक स्कूल का ड्रेस कोड सभी बच्चों के लिए समान है, सही मंशा से बनाया गया है और किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, तब तक ड्रेस तय करने का अधिकार स्कूल प्रशासन के पास है।

कोर्ट ने कहा कि अगर स्कूल ने पहले कभी हेडस्कार्फ यानी हिजाब पहनने की अनुमति दी भी थी, तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह छात्रा का हमेशा के लिए पक्का अधिकार बन गया। स्कूल प्रशासन अपने नियमों में बदलाव करने के लिए स्वतंत्र है और पुरानी छूट को जारी रखने के लिए बाध्य नहीं है।

कोर्ट ने कहा- हिजाब इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं

कोर्ट ने कहा कि जहां भी यह मुद्दा उठा है, हाईकोर्ट की राय एक रही है कि महिलाओं के लिए हिजाब पहनना इस्लाम का कोई जरूरी हिस्सा नहीं है। ऐसा नहीं है कि इसके बिना धर्म खतरे में पड़ जाएगा या इसे न पहनने पर महिला धर्म से बाहर हो जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि इसे साबित करने के लिए कोई तथ्य या सबूत भी पेश नहीं किए गए हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा,

“याचिका में यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री या धार्मिक ग्रंथों का हवाला नहीं दिया गया कि स्कार्फ पहनना इस्लाम का ‘अनिवार्य धार्मिक आचरण’ है। इस आधार पर अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सका।”

आस्था पर रोक नहीं, संस्थागत नियमों के पालन की बात

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केरल, बॉम्बे और कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया।

‘फातिमा तस्नीम बनाम केरल राज्य’ मामले में कोर्ट ने कहा था कि एक तरफ छात्र या छात्रा को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है, तो दूसरी तरफ स्कूल या संस्था को अपने नियम-कायदे चलाने का अधिकार है। जब दोनों अधिकारों के बीच टकराव होता है, तो व्यक्तिगत पसंद के बजाय संस्था के बड़े हित और अनुशासन को ज्यादा महत्व दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में ‘आयशा शिफा बनाम कर्नाटक राज्य’ मामले में दो जजों की राय बंटी हुई थी। इसलिए इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल छात्रा की आस्था पर रोक नहीं लगा रहा, बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन और यूनिफॉर्म के पालन की अपेक्षा कर रहा है। इसके बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।