Ad Image
Ad Image
पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया || PM के आवास के बाहर पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर धरने पर राहुल गांधी || PM मोदी के आवास के बाहर धरने पर राहुल गांधी समेत कांग्रेस के सभी दिग्गज || अमेरिकी और ईरान के बीच प्रारंभिक समझौता, 60 दिन का सीजफायर लागू || अमेरिकी सेंट्रल कमान की घोषणा, ईरान की नाकेबंदी समाप्त || ईरान - अमेरिका में टकराव चरम पर, नए हमलों से सीजफायर पर लग सकता ब्रेक || जापान: तूफान जोंगमी ने मचाई तबाही, 60 हजार से अधिक घरों में बिजली गुल || जयराम रमेश ने लिखा पत्र, ग्रेट निकोबार परियोजना पर पुनर्विचार की अपील || नई दिल्ली के मालवीय नगर स्थित रेस्टोरेंट में आग से 20 की मौत, दर्जनों घायल || ट्रंप ने कहा, खाड़ी देशों की अपील पर ईरान पर हमले बंद किए गए

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

स्वतंत्रता के 79 साल: क्या सच में स्वतंत्र है भारत?

स्पेशल रिपोर्ट, आकाश अस्थाना ।

मोतिहारी/नई दिल्ली। 15 अगस्त 1947 को भारत ने अंग्रेज़ी शासन (ईस्ट इंडिया कंपनी) की बेड़ियों को तोड़कर आज़ादी हासिल की थी। 79 वर्षों बाद जब देश एक तरफ़ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब एक सवाल फिर से देश के चौक-चौराहों, गांवों, कस्बों और शहरों में गूंज रहा है: क्या सच में भारत स्वतंत्र है?

यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति है, तो भारत निस्संदेह स्वतंत्र है। लेकिन यदि स्वतंत्रता का अर्थ बेहतर शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छ हवा, जवाबदेह व्यवस्था, भ्रष्टाचार से मुक्ति और सम्मानजनक जीवन है, तो यह सवाल आज भी अधूरा दिखाई देता है।

चुनावी वादे और जनता की उम्मीदें

देश में हर पांच साल पर चुनाव आते हैं। राजनीतिक दल जनता के बीच जाते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, रोजगार देने, महंगाई कम करने, शिक्षा सुधारने और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने की बात करते हैं। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की कई मूलभूत समस्याएं वहीं की वहीं रह जाती हैं।

कांग्रेस हो, भाजपा हो, क्षेत्रीय दल हों या अन्य राजनीतिक शक्तियां; हर दल ने अपने-अपने दौर में विकास के दावे किए हैं। कई क्षेत्रों में उपलब्धियां भी हुई हैं, लेकिन यह भी सच है कि करोड़ों भारतीय आज भी उन सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं जो एक विकसित राष्ट्र की पहचान होती हैं।

स्कूल हैं, लेकिन क्या शिक्षा भी है?

देश में स्कूलों की संख्या बढ़ी है, नामांकन भी बढ़ा है। ASER 2024 के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के स्कूल नामांकन में सुधार हुआ है। (Press Information Bureau)

लेकिन सवाल सिर्फ स्कूल में नाम लिखवाने का नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का है। कई सरकारी स्कूल आज भी शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं के अभाव और कमजोर शिक्षण स्तर जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट भी शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने के परिणामों को लेकर गंभीर चुनौतियों का उल्लेख करती है। (World Bank)

जब एक गरीब परिवार अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजता है और फिर भी बेहतर भविष्य की गारंटी नहीं मिलती, तो क्या उसे शिक्षा की वास्तविक स्वतंत्रता मिली है?

इलाज का अधिकार, लेकिन इलाज की कीमत?

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी तस्वीर मिश्रित है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से लाखों लोगों को लाभ मिला है, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में लोग इलाज के खर्च के कारण आर्थिक संकट में पहुंच जाते हैं।

कॉमनवेल्थ फंड की रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है। 2023 तक लगभग 30 प्रतिशत आबादी किसी भी स्वास्थ्य बीमा कवरेज से बाहर थी। (Commonwealth Fund)

गांवों और छोटे शहरों में आज भी गंभीर बीमारी होने पर मरीजों को बड़े शहरों की ओर भागना पड़ता है। कई परिवार इलाज के लिए कर्ज लेते हैं या अपनी जमीन तक बेच देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्वास्थ्य के क्षेत्र में आम नागरिक वास्तव में स्वतंत्र है?

विकास या प्रदूषण?

देश में एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, मेट्रो दौड़ रही है, उद्योग बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके साथ प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है।

विश्व बैंक के अनुसार भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल है और 1.4 अरब लोगों का बड़ा हिस्सा अस्वास्थ्यकर वायु गुणवत्ता के संपर्क में है। वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों को भारी नुकसान होता है। (World Bank)

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार वायु प्रदूषण से जुड़ी मृत्यु दर भारत में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। (datadot)

दिल्ली, पटना, कानपुर, लखनऊ जैसे बड़े शहर ही नहीं, बल्कि छोटे शहर और कस्बे भी अब धूल, धुएं और कचरे की समस्या से जूझ रहे हैं। विकास की दौड़ में स्वच्छ हवा कहीं पीछे छूटती दिखाई देती है।

जनता और जनप्रतिनिधि के बीच बढ़ती दूरी

चुनाव के दौरान नेता घर-घर पहुंचते हैं। हाथ जोड़ते हैं, समस्याएं सुनते हैं और समाधान का वादा करते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद आम नागरिक को अपने ही जनप्रतिनिधि तक पहुंचने के लिए कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।

ग्रामीण इलाकों में अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि सांसद और विधायक चुनाव के समय तो गांव में दिखाई देते हैं, लेकिन बाद में मिलने का समय तक नहीं मिलता। कई लोग आरोप लगाते हैं कि कार्यालयों में उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ता है और कभी-कभी सुरक्षाकर्मियों द्वारा अपमानजनक व्यवहार का सामना भी करना पड़ता है।

पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल

देश के अनेक हिस्सों में पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन आम नागरिकों के बीच पुलिस की कार्यशैली को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। कई मामलों में लोगों को शिकायत रहती है कि उनकी एफआईआर दर्ज नहीं होती, सुनवाई में देरी होती है या प्रभावशाली लोगों के मामलों में अलग व्यवहार दिखाई देता है। हालांकि पुलिस व्यवस्था में सुधार के प्रयास लगातार हुए हैं, फिर भी जनता और पुलिस के बीच विश्वास की दूरी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।

दूसरे देशों से क्या सीख सकता है भारत?

  • भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ। दक्षिण कोरिया 1945 में जापानी कब्जे से मुक्त हुआ और सिंगापुर 1965 में स्वतंत्र राष्ट्र बना।
  • आज दक्षिण कोरिया का मानव विकास सूचकांक (HDI) 0.937 है और वह विश्व के शीर्ष विकसित देशों में शामिल है। (UNDP)
  • सिंगापुर का HDI 0.946 है और वह शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा प्रशासनिक दक्षता के लिए दुनिया में उदाहरण माना जाता है। (UNdata)

भारत ने भी उल्लेखनीय प्रगति की है; अंतरिक्ष मिशन, डिजिटल भुगतान, सड़क नेटवर्क, रक्षा क्षमता और वैश्विक प्रभाव में देश आगे बढ़ा है। लेकिन जब शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रदूषण और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे क्षेत्रों की बात आती है, तब तुलना कई कठिन प्रश्न खड़े करती है।

असली स्वतंत्रता का अर्थ

स्वतंत्रता केवल तिरंगा फहराने का नाम नहीं है। स्वतंत्रता तब होगी जब:-

  • हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले,
  • हर नागरिक बिना आर्थिक भय के इलाज करा सके,
  • हर व्यक्ति स्वच्छ हवा में सांस ले सके,
  • जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हों,
  • पुलिस और प्रशासन आम नागरिक के मित्र बनें,
  • और न्याय तथा अवसर सभी को समान रूप से प्राप्त हों।

अंततः , 79 वर्षों में भारत ने लंबा सफर तय किया है। यह कहना गलत होगा कि देश ने प्रगति नहीं की। लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि हर भारतीय तक स्वतंत्रता का लाभ समान रूप से पहुंच चुका है।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है;

क्या भारत केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है, या सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक रूप से भी पूरी तरह स्वतंत्र हो चुका है? इस सवाल का जवाब आज भी देश की सड़कों, सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, प्रदूषित हवा और आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी में खोजा जा रहा है।

||| भारत माता की जय, वंदे मातरम् |||