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स्वयं का समर्पण ही परमात्मा की प्राप्ति है: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: परमात्मा ने इस जगत में हर किसी को अलग स्वभाव देकर एक दूसरे के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का आदेश दिया है।उक्त बातें लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा की।ईश्वर के आदेश का जो जितनी सफलता से पालन कर लेते, ईश्वर उनके जीवन को उतना ही सरल और खुशियों से भर देते हैं,वरना परस्पर राग द्वेष और वैमनस्यता के विकारों के साथ ही हम अपनी पुरी आयु क्षीण करके वापस अधर्म स्थिति में जाने के लिए यहां से लौट जाते और बड़े ही घाटे का सौदा साबित होता ये जीवन। हमारा ये दुर्लभ मानव जीवन,हमारी मानव जीवन की योग्यता की कसौटी संसार से तालमेल बिठाने में ही पहचानी जाती,शेष खूबियां तो भौतिक सुखों के संचय में काम आती है। एक इच्छा के पूरे होते ही दूसरी इच्छा का जन्म हो जाना ही मानव मन का स्वभाव है। मनुष्य आवश्यकता से नहीं अपितु अनंत इच्छा से दुःखी रहता है।आवश्यकता कभी भी पूर्ण हो सकती लेकिन इच्छा का पूर्ण होना कभी संभव ही नहीं है।इच्छाएं आज तक बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट की भी पूरी नहीं हुई है।आज हमारी स्थिति यह है कि जो प्राप्त है,उसका आनंद नहीं लेते लेकिन जो प्राप्त नहीं है उसकी चिंता करके जीवन को शोकमय कर देते हैं। आपका जीवन भी एक मधुमक्खी के सामान है जो द्वार खुला होने के बावजूद बाहर निकलने के लिए दीवार से टकराती रहती है।कौन उसे समझाए,नासमझ रुक जहां से तेरा आना हुआ है,द्वार वही है,आपका हृदय भी परमात्मा से खाली है,अब परमात्मा को पाने के लिए कुछ नहीं करना है बस स्वयं से खाली हो जाना है। चित्त जब शांत होता है और देखता है तो द्वार मिल जाता है।शांत और शून्य चित्त ही द्वार है।मिली हुई खुशी को जी भर के जिएँ।जिन्दगी के रंगमंच पर कोई भी अभिनय दोहराया नही जाता।ये बातें हम जितनी जल्दी समझ लें,अपना जीवन आनंदमय कर सकते हैं।