नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय |
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट के उस विवादास्पद फैसले पर तीखे सवाल उठाए, जिसमें 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में भाग लेने को लेकर गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक द्वितीय वर्ष के छात्र को नोटिस जारी किया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की सदस्यता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष यह मामला मौखिक रूप से उठाया गया।
वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि यह नोटिस नोएडा पुलिस की एक रिपोर्ट के आधार पर छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी नेतृत्व वाले प्रदर्शन में शामिल होने के लिए अन्य छात्रों को उकसा रहा था। यह नोटिस 4 सितंबर को 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (बीएनएसएस) की धारा 130 के तहत जारी किया गया था, जिसमें छात्र से शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था। छात्र ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि उसने शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन में भाग लिया था।
मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, "एक मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है? हमने स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। कोई भी मजिस्ट्रेट उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।" अदालत ने याद दिलाया कि उसने 1 सितंबर को अपने आदेश में 20 से 25 जुलाई के बीच देशभर में सीजेपी-नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकियां (एफआईआर) रद्द कर दी थीं और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया था।
वकील ने बताया कि यह नोटिस लागू होने वाला ही था, लेकिन प्रेस में मामला उजागर होने के बाद इसे वापस ले लिया गया। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि नोटिस वापस लिए जाने से अदालत के आदेश के उल्लंघन की गंभीरता कम नहीं होती। वकील ने इसे "प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना" करार देते हुए आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश और नोएडा प्रशासन छात्रों के बीच "भय का माहौल" बनाने का "प्रयोग" कर रहे हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर उसकी रोक केवल दिल्ली तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होती है जहां सीजेपी से जुड़े प्रदर्शन हुए थे। पीठ ने वकील को नोटिस को याचिका के माध्यम से रिकॉर्ड पर लाने को कहा और संबंधित प्राधिकरण से इस बारे में स्पष्टीकरण मांगने की बात कही।
गौरतलब है कि 20 जुलाई को दिल्ली में हुए सीजेपी के मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई थी, जिसमें संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े गए थे। यह प्रदर्शन मूल रूप से नीट परीक्षा पेपर लीक मामले से जुड़ा था, जिसमें कई छात्रों की जान जाने के बाद अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था।







