नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि नए नियमों को लेकर छात्रों की ओर से उठाई गई आपत्तियों और चिंताओं पर दोबारा विचार किया जा रहा है। सरकार इन नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने के विकल्प पर भी विचार कर रही है, ताकि किसी भी वर्ग के विद्यार्थियों को भेदभाव या असंतोष का सामना न करना पड़े। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सरकार इस पूरे मामले को गंभीरता से देख रही है।
केंद्र की दलील सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी नीति का उद्देश्य सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलना होना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि ऐसी व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए, जिससे देश के सभी युवा संतुष्ट महसूस करें। किसी भी वर्ग के छात्र को यह नहीं लगना चाहिए कि उसके साथ अन्याय या भेदभाव किया जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नीतियां बनाते समय सभी पक्षों की चिंताओं और उनके हितों का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि शिक्षा संस्थानों में समानता और आपसी विश्वास का माहौल बना रहे।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए थे। इन प्रावधानों को लेकर विवाद शुरू हो गया और इन्हें चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गईं।याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नए नियमों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को इसमें शामिल नहीं किया गया है। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने यह भी आपत्ति जताई कि नियमों में झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं रखा गया है। उनका कहना था कि इस तरह की व्यवस्था का दुरुपयोग होने की आशंका है और इससे विद्यार्थियों के बीच भेदभाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर लगाई थी रोक
इससे पहले 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी थी। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रारंभिक तौर पर टिप्पणी की थी कि इन नियमों की भाषा और प्रावधान समाज में विभाजन पैदा करने वाले हो सकते हैं। अदालत ने इनके दुरुपयोग की आशंका भी जताई थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया था कि फिलहाल यूजीसी के वर्ष 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे। नए नियमों पर रोक लगाने के साथ अदालत ने इनके प्रावधानों की समीक्षा की आवश्यकता पर भी जोर दिया था।
उस समय सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि आजादी के 75 साल बाद देश जातिरहित समाज की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में यदि कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में जाति के आधार पर विवाद और टकराव बढ़ते हैं, तो यह विचार करना जरूरी है कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने जोर दिया था कि शिक्षा संस्थानों में समानता सुनिश्चित करने के साथ सामाजिक एकता को भी मजबूत किया जाना चाहिए। इसी क्रम में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि कोई भी नीति ऐसी होनी चाहिए, जो समाज को बांटने के बजाय एकजुट करने का काम करे।







