Ad Image
Ad Image
युद्ध समाप्ति पर ईरान के साथ सकारात्मक बातचीत हुई: राष्ट्रपति ट्रंप || बिहार: विजय कुमार सिन्हा, निशांत कुमार, दिलीप जायसवाल, दीपक प्रकाश समेत 32 ने ली शपथ || बिहार में सम्राट सरकार का विस्तार, 32 मंत्रियों ने ली पद और गोपनीयता की शपथ || वोट चोरी का जिन्न फिर निकला, राहुल गांधी का EC और केंद्र सरकार पर हमला || वियतनामी राष्ट्रपति तो लाम पहुंचे भारत, राष्ट्रपति भवन में पारंपरिक स्वागत || टैगोर जयंती पर 9 मई को बंगाल में भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण की संभावना || केरल में सरकार गठन की कवायद तेज: अजय माकन और मुकुल वासनिक पर्यवेक्षक || असम में बीजेपी जीत के हैट्रिक की ओर, 101 से अधिक पर बढ़त, कांग्रेस 23 पर सिमटी || पांच राज्यों में मतगणना जारी: बंगाल, असम में भाजपा को बढ़त, केरल में कांग्रेस और तमिलनाडु में टीवीके को बढ़त || तमिलनाडु चुनाव: एक्टर विजय की टीवीके ने किया उलटफेर, 109 सीटो पर बढ़त

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

UPSC में गाड़ा झंडा: बंदूक की विरासत छोड़ ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती ने थामी 'कलम'

स्टेट डेस्क, एन के सिंह।

ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती आकांक्षा सिंह ने 301वीं रैंक के साथ रचा इतिहास; अतीत के साये से निकलकर व्यवस्था का हिस्सा बनने की प्रेरक कहानी।

पटना: बिहार की माटी ने एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया है कि यहाँ की प्रतिभाओं को न तो विपरीत परिस्थितियाँ रोक सकती हैं और न ही अतीत की परछाइयाँ। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के ताजा नतीजों में एक ऐसा नाम चमक कर उभरा है, जिसने बिहार के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। यह नाम है आकांक्षा सिंह का। 90 के दशक में बिहार के 'नक्सल विरोधी' आंदोलन का चेहरा रहे और रणवीर सेना के संस्थापक दिवंगत ब्रह्मेश्वर सिंह 'मुखिया' की पोती आकांक्षा ने सिविल सेवा परीक्षा में 301वीं रैंक हासिल कर अपनी मेधा का लोहा मनवाया है।

विरासत से अलग, खुद की पहचान की जिद

आकांक्षा की यह जीत महज एक परीक्षा पास करना नहीं है, बल्कि खुद को एक नई पहचान देने की जद्दोजहद की सुखद परिणति है। जहाँ एक ओर उनके दादा का नाम विवादों, संघर्षों और वर्चस्व की कहानियों से घिरा रहा, वहीं आकांक्षा ने 'कलम' को अपना हथियार बनाया। उन्होंने साबित कर दिया कि नई पीढ़ी अपनी काबिलियत के दम पर अपना रास्ता खुद चुन सकती है।
 

चुनौतियों की आग में तपकर कुंदन बनीं आकांक्षा
आकांक्षा का सफर फूलों की सेज नहीं था। पारिवारिक सूत्रों की मानें तो उनका बचपन काफी उथल-पुथल भरा रहा।
दादा की हत्या और उसके बाद परिवार पर आए कानूनी व मानसिक संकटों ने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया।

प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें सत्ता की नहीं, बल्कि 'सेवा' की कुर्सी पर बैठना है।

 विवादों के शोर के बीच खुद को शांत रखकर पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना उनकी सबसे बड़ी जीत रही।

 "सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मेरे परिवार का इतिहास चाहे जो भी रहा हो, मेरा लक्ष्य हमेशा स्पष्ट था—देश की सेवा करना और अपनी मेहनत से अपनी पहचान बनाना।" 
 आकांक्षा सिंह 

भोजपुर से पटना तक जश्न: 'बिहार की बेटी' पर गर्व
जैसे ही आकांक्षा की सफलता की खबर उनके पैतृक गांव खोपिरा (भोजपुर) पहुंची, वहां आतिशबाजी और मिठाइयों का दौर शुरू हो गया। पटना स्थित उनके आवास पर बधाई देने वालों का तांता लगा है।

सोशल मीडिया पर ट्रेंड इंटरनेट पर लोग उन्हें "बिहार की असली ताकत" बता रहे हैं।
 
युवाओं के लिए प्रेरणा

स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि आकांक्षा उन हजारों युवाओं के लिए मिसाल हैं जो कठिन पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण हार मान लेते हैं।

बिहार कैडर और जमीनी बदलाव

301वीं रैंक हासिल करने के बाद अब आकांक्षा भारतीय प्रशासनिक तंत्र (Bureaucracy) का हिस्सा बनेंगी। उनके करीबियों के अनुसार, उनकी दिली इच्छा बिहार कैडर में ही रहकर काम करने की है। वे चाहती हैं कि राज्य के विकास में अपनी भागीदारी निभाएं और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुधार ला सकें।
संपादकीय टिप्पणी:
आकांक्षा सिंह की यह सफलता एक बड़ा संदेश देती है—इतिहास चाहे कितना भी भारी क्यों न हो, भविष्य हमेशा हमारे हाथों में होता है। उन्होंने पुरानी पीढ़ी की छाया से निकलकर अपनी मेहनत के दम पर सफलता का सूरज उगाया है।