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आत्मा का प्रकाशमान होना ही जीवन की सार्थकता: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: मनुष्य जो चाहता है वह उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति ही है, परंतु उसके लिए उसे चेतना के गहन तल में प्रवेश करना पड़ता है।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता  बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।साधारणतः हम जैसा जीवन जीते हैं,उसमें कोई विशेषता नहीं।

जब तक स्रोत की गरिमा अनुरूप जीवन नहीं जिया जाएगा,तब तक उन्नति संभव नहीं।जिसकी आत्मा प्रकाशित है,वही उसे उच्चतर ध्येय की दिशा में लगा पाएगा।इसे ही योग कहते हैं।भीतर के सब विकार मिट जाएँ,स्पष्टता की प्राप्ति हो,चिंतन-चरित्र एकरूप बनें यही उसको साधने की प्रक्रिया है।जिस संपदा के हम अधिकारी हैं,वह अत्यंत ही महान है।उसी से नवविधान होता है तथा पीड़ा-अड़चन नहीं रह पाती है।इस यात्रा में सजग होने की आवश्यकता है।अपने गुण-कौशल को ऊंचाई के प्रति समर्पित कर ही आगे बढ़ा जाता है।धीरे- धीरे स्वतः ही प्रेरणा के वशीभूत हो अद्भुत आलोक का विस्तार होता है।यही धन्यता है तथा प्रेम की प्रज्वलित ज्योति भी।जितने भी बाह्य व्यवहार हैं,वे इससे होने लगते हैं।उसमें राग-द्वेष की भावना नहीं रह जाती,समर्पण बना रहता है तथा उत्सार्ग की नीति ही प्रधानतः रहती है।ऐसा तभी संभव है यदि मनोभूमि उस अनुकूल बन जाए,जिसे कि आदर्श कहा जा सके।हमारे पास स्वयं को विकसित करने की कला होनी चाहिए।इसके बाद ऊर्जा-उल्लास बने रहते हैं,चित्त सदा शांत तथा समताग्रही रहता है तथा आनंद की रश्मियाँ फूटा करती हैं।जितनी भी विकृतियाँ हैं उनका अस्तित्व मात्र भटकाव के कारण है - उन्हें दूर करना है तो उन पर पैनी दृष्टि रखनी होगी।सच में निश्चिंतता तो यहीं पर है।सांसारिक कोलाहल में एक इसी का अवलंबन लिया जाए।बिना रुके अदृश्य को साकार करने वाले ही अध्यात्म पथ के पथिक होते हैं।आइए,हम सभी एक साथ आने वाले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पे योग की महता को समझते हुए सभी को योग करने के प्रति जागरूक करें।