नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नयी दिल्ली, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जतायी गयी है। जारी नवीनतम दीर्घावधि पूर्वानुमान के अनुसार जून से सितंबर के बीच होने वाली मौसमी बारिश लंबी अवधि के औसत (एलपीए) के लगभग 90 प्रतिशत के आसपास रह सकती है, जिसमें चार प्रतिशत तक की घट-बढ़ संभव है। अनुमान बताता है कि देश के अनेक हिस्सों में वर्षा सामान्य स्तर से नीचे रह सकती है, जिससे कृषि गतिविधियों, जल संसाधनों, जलविद्युत उत्पादन तथा पर्यावरणीय संतुलन पर प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गयी है।
रिपोर्ट के अनुसार देश के अधिकांश क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर इलाकों में इसका असर अधिक दिखाई दे सकता है। कम बारिश की स्थिति से सूखे जैसी परिस्थितियां बनने, पेयजल स्रोतों पर दबाव बढ़ने और गर्मी की तीव्रता में वृद्धि होने की आशंका व्यक्त की गयी है। हालांकि पूर्वोत्तर भारत में मानसून की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रहने का अनुमान है और वहां सामान्य श्रेणी की वर्षा दर्ज हो सकती है। दूसरी ओर मध्य भारत, दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों तथा उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की संभावना अधिक बतायी गयी है।
देश के प्रमुख वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों को समाहित करने वाले मानसून कोर जोन में भी वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान है। यह क्षेत्र खरीफ फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और यहां कम वर्षा का प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचता है तो खेती-किसानी के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर दिखाई दे सकता है। जलाशयों में पानी के संग्रहण और सिंचाई व्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ने की संभावना है।
जून माह के लिए जारी अनुमान में भी पूरे देश में सामान्य से कम वर्षा की संभावना व्यक्त की गयी है। आकलन के अनुसार जून की बारिश दीर्घावधि औसत के 92 प्रतिशत से कम रह सकती है। हालांकि उत्तर-पश्चिम भारत, पूर्वोत्तर क्षेत्र, दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों तथा मध्य भारत के चुनिंदा इलाकों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना जतायी गयी है। इसके बावजूद देश के बड़े भूभाग में वर्षा की कमी बनी रह सकती है, जिससे मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं।
तापमान के मोर्चे पर भी राहत के संकेत सीमित हैं। जून के दौरान देश के अधिकांश क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने का अनुमान है। केवल मध्य, उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से कम रहने की संभावना जतायी गयी है। इसी प्रकार न्यूनतम तापमान भी अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से अधिक रह सकता है, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और उससे सटे दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कुछ इलाकों में रात का तापमान सामान्य से नीचे रहने की संभावना है।
गर्मी और लू की स्थिति भी कई राज्यों में चिंता का विषय बनी रह सकती है। अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश के अनेक हिस्सों में सामान्य से अधिक लू चल सकती है। इसके अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में भी भीषण गर्मी और लू का प्रभाव देखने को मिल सकता है। वहीं राजस्थान और झारखंड में इस बार सामान्य से कम लू चलने की संभावना व्यक्त की गयी है, जिससे इन राज्यों को अपेक्षाकृत राहत मिल सकती है।
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर क्षेत्र में तटस्थ स्थिति धीरे-धीरे अल नीनो की ओर बढ़ रही है। नवीनतम जलवायु मॉडल बताते हैं कि मानसून के मौसम के दौरान अल नीनो की परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं। सामान्यतः अल नीनो का प्रभाव भारतीय मानसून को कमजोर करने वाला माना जाता है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले जारी पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान में भी सामान्य से कम वर्षा की संभावना व्यक्त की गयी थी और ताजा अनुमान ने उस आशंका को और मजबूत किया है।







