विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ अंतिम समझौते के तहत प्रतिबंधों में राहत देने और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए तेहरान को अपने परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर ठोस प्रगति दिखानी होगी। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका मध्यस्थों के जरिए ईरान के साथ सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत कर रहा है, लेकिन परमाणु मुद्दों का समाधान किए बिना किसी अंतिम समझौते तक पहुंचना संभव नहीं होगा। यह जानकारी ऐसे समय सामने आई है, जब दोनों देशों को दोबारा बातचीत की मेज पर लाने के लिए मध्यस्थों के जरिए प्रयास चल रहे हैं।
अमेरिकी पक्ष के अनुसार, प्रतिबंधों में राहत और फ्रीज संपत्तियों को जारी करने का विकल्प अंतिम समझौते का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसके लिए पहले परमाणु मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता जरूरी होगी। यानी आर्थिक राहत को सीधे तौर पर परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी प्रगति के साथ जोड़ा गया है। अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि मध्यस्थों के माध्यम से बातचीत चल रही है और दोनों पक्षों के बीच चर्चा सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख सवालों का समाधान किए बिना समझौता नहीं किया जा सकता।
इस बीच, ट्रंप ने शनिवार को ईरान के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और परमाणु मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ाने की बात कही गई थी। ट्रंप ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार्य बताया था। ईरान के प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के बदले अमेरिका की ओर से कुछ आर्थिक और अन्य प्रतिबंधात्मक कदमों में राहत की मांग शामिल थी। अमेरिका की ओर से संयुक्त राष्ट्र में राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने कहा कि ईरान बातचीत शुरू होने से पहले ही कई रियायतें हासिल करना चाहता था, जिसे अमेरिकी पक्ष स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
हालांकि प्रस्ताव खारिज करने के बावजूद बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। ट्रंप ने रविवार को कहा कि उन्हें इस सप्ताह ईरान के साथ आगे और बातचीत होने की उम्मीद है। अमेरिकी पक्ष से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो बातचीत को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थों के जरिए संपर्क बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। मौजूदा स्थिति में अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष समझौते के बजाय मध्यस्थों के माध्यम से बातचीत आगे बढ़ रही है।
ट्रंप ने ईरान के हालिया प्रस्ताव को लेकर कहा था कि तेहरान समझौता करना चाहता है, लेकिन वह उस तरह का समझौता नहीं है जिसे अमेरिका स्वीकार करना चाहता है। उनके मुताबिक, ईरान की ओर से रखी गई शर्तों पर अमेरिका शायद करीब एक साल पहले सहमत हो सकता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। ट्रंप ने कहा कि ईरान ने अपनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ा दिया है। इसके बावजूद उन्होंने इस सप्ताह फिर बातचीत होने की संभावना जताई है। इससे संकेत मिलता है कि प्रस्ताव को खारिज करने के बाद भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश बनी हुई है।
परमाणु मुद्दे पर ईरान की ओर से भी कुछ लचीलेपन के संकेत मिले हैं। अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, तेहरान ने संकेत दिया है कि वह परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अपने रुख में कुछ बदलाव और प्रतिबद्धताओं पर चर्चा के लिए तैयार है। हालांकि, अभी दोनों पक्ष इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि इन प्रतिबद्धताओं को कब और किस समय लागू किया जाएगा। ऐसे में परमाणु कार्यक्रम, उसकी निगरानी और उससे जुड़ी शर्तें बातचीत में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में बनी हुई हैं। अमेरिका की ओर से अंतिम समझौते के लिए इन्हीं मुद्दों पर ठोस प्रगति को जरूरी बताया जा रहा है।
अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने भी ईरान के प्रस्ताव को खारिज किए जाने की वजह बताई। उन्होंने कहा कि ट्रंप को भरोसा नहीं है कि तेहरान बातचीत को गंभीरता और ईमानदारी के साथ आगे बढ़ा रहा है। उनके अनुसार, ईरान बातचीत शुरू होने से पहले ही सभी प्रमुख रियायतें हासिल करना चाहता था और उसके बाद चर्चा करने की बात कर रहा था। इसी वजह से अमेरिकी प्रशासन को ईरान की मंशा पर भरोसा नहीं हुआ। फिलहाल दोनों देशों के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी रखने की कोशिश है और संभावित अंतिम समझौते में आर्थिक राहत के बदले परमाणु मुद्दे पर ठोस प्रगति अमेरिकी पक्ष की प्रमुख शर्त बनी हुई है।







