लोकल डेस्क, एन के सिंह।
मौत को मात, कालाजार की हार, जब 1.80 लाख की बेबसी पर भारी पड़ी सरकारी 'संजीवनी', चांदनी की मुस्कान ने लिखी जीत की नई दास्तां।फरिश्ता बनकर पहुंची आशा कार्यकर्ता नेरातून की सजगता ने एक गरीब पिता को टूटने से बचाया।
पूर्वी चंपारण: "डॉक्टर ने कहा कि पौने दो लाख लाओ, तभी इलाज शुरू होगा... उस पल मुझे अपनी कलेजे के टुकड़े के चेहरे में साक्षात मौत नजर आने लगी थी।" यह रुंधा हुआ गला मोतिहारी के तुरकौलिया स्थित सपही गाँव निवासी लालबाबू मांझी का है। एक दिहाड़ी मजदूर, जिसके लिए हजारों जुटाना पहाड़ तोड़ने जैसा है, उसके सामने जब लाखों का बिल रखा गया, तो उसकी दुनिया उजड़ती दिखी। लेकिन आज, यह कहानी हार की नहीं बल्कि उस 'चाँदनी' की है जिसने मौत के मुहाने से लौटकर पूरे सिस्टम के लिए एक मिसाल पेश की है।
बीमारी का कालचक्र, जब सूखने लगी मासूम की काया
कहानी शुरू होती है वर्ष 2024 की शुरुआत से। जैसे-जैसे शीत ऋतु विदा ले रही थी, 10 वर्षीय चांदनी को हल्के बुखार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। लालबाबू ने इसे साधारण बुखार समझा, लेकिन हफ्तों बीतने के बाद भी तपिश कम नहीं हुई। चांदनी का शरीर सूखकर कांटा होने लगा, भूख मर गई और सबसे खौफनाक था उसका पेट, जो कालाजार के कारण असामान्य रूप से फूलने लगा था। बदहवास पिता जब गनौली के एक निजी अस्पताल पहुंचे, तो वहां डॉक्टर ने दो टूक कह दिया— "इसे कालाजार है, 1 लाख 80 हजार का इंतजाम करो, तभी सांसें बचेंगी।" बिना पैसों के इलाज नामुमकिन देख लालबाबू अपनी बेटी को घर ले आए, यह मानकर कि अब सब भगवान भरोसे है।
फरिश्ता बनीं आशा कार्यकर्ता, अंधेरे में उम्मीद की किरण
जहाँ उम्मीद के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे, वहां आशा कार्यकर्ता नेरातून एक देवदूत बनकर दाखिल हुईं। रोते-बिखरते परिवार को देख नेरातून ने तुरंत मोर्चा संभाला। वे जानती थीं कि कालाजार जानलेवा है, पर यह भी जानती थीं कि सरकारी अस्पताल में इसका सटीक और पूरी तरह मुफ्त इलाज उपलब्ध है। उनके साहस और भरोसे ने टूटे हुए परिवार को फिर से खड़ा किया और वे चांदनी को लेकर तुरकौलिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। यहाँ स्वास्थ्य कर्मी ओमकारनाथ के सक्रिय सहयोग से चांदनी को 10 मई 2024 को एम्बुलेंस के जरिए मोतिहारी सदर अस्पताल भेजा गया।
तीन दिन का 'चमत्कार' और नया जीवनदान
सदर अस्पताल में डॉक्टरों की विशेष टीम ने चांदनी की कमान संभाली। जिस इलाज के लिए निजी लुटेरे लाखों की मांग कर रहे थे, वहां वह पूरी तरह नि:शुल्क शुरू हुआ। सरकारी दवाओं और डॉक्टरों की कड़ी निगरानी का असर ऐसा हुआ कि महज तीन दिनों के भीतर चांदनी की हालत में जादुई सुधार दिखने लगा। 13 मई 2024 को जब चांदनी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो लालबाबू की आंखों से बहते आंसू इस बार गम के नहीं, बल्कि बेइंतहा खुशी के थे। जिस बेटी की अर्थी का डर था, वह आज अपने पैरों पर चलकर घर लौट रही थी।
आज की सुखद तस्वीर: जनवरी 2026 की 'ऊर्जावान' चांदनी
वक्त का पहिया घूमा और आज जनवरी 2026 है। चांदनी अब सिर्फ स्वस्थ ही नहीं है, बल्कि वह अपने टोले की सबसे चंचल और ऊर्जावान बच्ची बन चुकी है। वह स्कूल जाती है, खेलती है और उसकी खिलखिलाहट पूरे मांझी टोले में गूंजती है। सरकार ने न केवल उसका इलाज किया, बल्कि पोषण के लिए ₹7,100 की प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की। तुरकौलिया के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अर्जुन गुप्ता गर्व से कहते हैं कि चांदनी का केस एक उदाहरण है कि कालाजार से डरना नहीं, बल्कि लड़ना है और सरकारी व्यवस्था पर अडिग विश्वास रखना है।
गांव में जागरूकता की नई लहर
चांदनी की इस जीत ने सपही गांव के 'मांझी टोले' की सोच बदल दी है। लालबाबू और उनकी पत्नी अब इलाके के 'स्वास्थ्य दूत' बन चुके हैं। आज उस टोले में किसी को बुखार की आहट भी होती है, तो लोग निजी क्लिनिकों के चक्कर काटने के बजाय सीधे सरकारी अस्पताल का रुख करते हैं। चांदनी की मुस्कान आज इस सच की सबसे बड़ी गवाह है कि अगर सही समय पर सही सलाह मिल जाए, तो मौत को भी मात दी जा सकती है।







