स्पोर्ट्स डेस्क, शिवेश कुमार शौर्य।
सब्जी बेचने से कॉमनवेल्थ तक... बिहार के झंडू कुमार ने ब्रॉन्ज जीतकर रचा इतिहास
नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला पदक जीतने वाले बिहार के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार की कहानी संघर्ष, त्याग और जुनून की मिसाल है। कभी परिवार का गुजारा चलाने के लिए सब्जियां बेचने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू ने अब देश के लिए कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मेंस हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग फाइनल में उनका यह प्रदर्शन भारत के लिए गौरव का क्षण बन गया।
बचपन में पोलियो, लेकिन नहीं छोड़ा सपना
बिहार के नालंदा जिले के हरनौत बाजार के रहने वाले 29 वर्षीय झंडू कुमार का जीवन शुरुआत से ही संघर्षों से भरा रहा। महज पांच साल की उम्र में वे पोलियो की चपेट में आ गए थे। शारीरिक चुनौती और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों से कभी समझौता नहीं किया। पावरलिफ्टिंग के प्रति उनका जुनून लगातार बढ़ता गया और उन्होंने पैरा तथा सक्षम दोनों वर्गों की राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
सब्जी बेचकर और ई-रिक्शा चलाकर चलाया घर
झंडू कुमार के परिवार का गुजारा हरनौत बाजार में सब्जी की दुकान से चलता था। परिवार की मदद के लिए वे रोज सुबह करीब 20 किलोमीटर दूर बिहार शरीफ जाकर ताजी सब्जियां खरीदते और बाजार में बेचते थे। शाम करीब चार बजे काम खत्म होने के बाद ही उन्हें जिम में अभ्यास का समय मिल पाता था। वह 'रॉकस्टार जिम' में कोच गौतम सिंह के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग करते थे। सीमित आमदनी के कारण एक खिलाड़ी के लिए जरूरी पोषण और प्रोटीन सप्लीमेंट का खर्च उठाना उनके लिए बड़ी चुनौती थी।
कोविड के दौर में बढ़ीं मुश्किलें
साल 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी परेशानियां और बढ़ गईं। हरनौत बाजार में ओवरब्रिज निर्माण के चलते परिवार की सब्जी की दुकान अस्थायी रूप से बंद हो गई। ऐसे में घर का खर्च चलाने के लिए झंडू ने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया। हालांकि, लंबे समय तक ई-रिक्शा चलाने के कारण उनके पास अभ्यास के लिए न पर्याप्त समय बचता था और न ही शरीर में ऊर्जा।
ई-रिक्शा बेचकर खेल के सपने पर लगाया दांव
हालात सामान्य होने के बाद परिवार की दुकान दोबारा शुरू हुई तो झंडू ने अपने खेल करियर को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया। उन्होंने वर्ष 2023 में अपना ई-रिक्शा बेच दिया, ताकि नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए यात्रा और प्रतियोगिता का खर्च जुटा सकें। हालांकि, इस प्रतियोगिता में वह एक भी सफल लिफ्ट दर्ज नहीं कर सके और उन्हें निराशा हाथ लगी।
यहीं से बदली किस्मत
राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान पैरा पावरलिफ्टिंग कोच राजिंदर सिंह रहेलू की नजर झंडू कुमार पर पड़ी। उन्होंने उनके जज्बे को पहचानते हुए उन्हें गांधीनगर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रशिक्षण का अवसर दिया। यही मौका उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
नेशनल रिकॉर्ड से कॉमनवेल्थ तक का सफर
बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलने के बाद झंडू कुमार का प्रदर्शन लगातार निखरता गया। उसी वर्ष नई दिल्ली में आयोजित पहले खेलो इंडिया पैरा गेम्स में उन्होंने रजत पदक जीता। 72 किलोग्राम वर्ग में 206 किलोग्राम वजन उठाकर उन्होंने नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया। इसके बाद बैंकॉक में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में 191 किलोग्राम भार उठाकर कांस्य पदक जीता और कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए क्वालिफाई किया।
भारत को दिलाया पहला पदक
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के मेंस हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग फाइनल में झंडू कुमार ने कांस्य पदक जीतकर भारत का पदक खाता खोला। उनका यह सफर साबित करता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियां भी उस खिलाड़ी का रास्ता नहीं रोक सकतीं, जिसके इरादे मजबूत हों। संघर्ष, मेहनत और अटूट आत्मविश्वास के दम पर झंडू कुमार ने न सिर्फ अपना सपना पूरा किया, बल्कि पूरे देश का सिर भी गर्व से ऊंचा कर दिया।







