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गोपालगंज: पपीता और केले ने बदली किसानों की तकदीर

 

लोकल डेस्क, मुस्कान कुमारी |

गोपालगंज: बिहार के गोपालगंज जिले में अब खेतों में धान-गेहूं की बालियां नहीं, पपीते और केले की हरी-हरी फसल लहरा रही है। सिर्फ दस साल में जिले के 70 हेक्टेयर खेत पपीते की खेती और इतने ही क्षेत्र में केले की खेती से भर गए हैं। किसान अब खेत से सीधे व्यापारियों को माल बेचकर लाखों रुपये कमा रहे हैं। परंपरागत खेती से मुश्किल से गुजारा करने वाले किसानों के घरों में अब पक्के मकान, बच्चों की अच्छी पढ़ाई और खुशहाली नजर आ रही है।

एक किसान ने दिखाया रास्ता, पूरा इलाका हो गया मालामाल

पंचदेवरी प्रखंड के कुइसा खुर्द गांव के किसान रामाशंकर पंडित ने साल 2010 में सबसे पहले पपीते की खेती शुरू की थी। पहले वे आठ बीघा में सिर्फ धान-गेहूं उगाते थे, लेकिन मौसम खराब होने पर लागत भी नहीं निकल पाती थी। कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने पपीता लगाया और पहली ही फसल से कमाई देखकर केले की खेती भी शुरू कर दी।

आज रामाशंकर पंडित के पास पक्का मकान है, तीनों बेटे उच्च शिक्षा ले रहे हैं, खेत में सोलर पंप लगा हुआ है और वे वर्मी कम्पोस्ट के साथ-साथ पपीते की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। उनकी सफलता देखकर पूरे इलाके के किसानों ने धान-गेहूं को अलविदा कह दिया।

खेत पर आते हैं व्यापारी, तौलकर ले जाते हैं ट्रक भर माल

कुइसा खुर्द और आसपास के गांवों के खेत अब पपीते और केले से हरे-भरे रहते हैं। पंचदेवरी सहित कई प्रखंडों के व्यापारी सीधे खेत पर पहुंचकर फसल खरीद लेते हैं। किसानों को बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती। पपीता 20-30 रुपये किलो और केला 25-40 रुपये किलो तक खेत पर ही बिक रहा है। एक एकड़ में औसतन 20-25 लाख रुपये तक की कमाई हो रही है, जो धान-गेहूं से कई गुना ज्यादा है।

50 एकड़ का इलाका बना फलों का हरा-भरा जंगल

पंचदेवरी प्रखंड और उसके आसपास के गांवों में अब करीब 50 एकड़ से ज्यादा जमीन पर सिर्फ पपीता और केला ही लहलहा रहा है। पड़ोस के kapuri गांव के किसान आतम सिंह ने भी बड़े स्तर पर केले की खेती शुरू की है। चुकंदर की खेती की ओर भी किसानों का रुझान बढ़ने लगा है।

किसान बताते हैं कि फल वाली खेती में एक बार लगाएं, तीन-चार साल तक कमाई होती रहे। पानी की भी कम जरूरत पड़ती है और बाजार की कोई चिंता नहीं। सरकारी योजनाओं से सब्सिडी पर पौधे, सोलर पंप और ड्रिप सिंचाई भी मिल रही है।

गोपालगंज के खेत अब साबित कर रहे हैं कि सही फसल चुन ली जाए तो खेती भी सोने का अंडा दे सकती है।