लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: जीवन एक प्रतिध्वनि है। हम संसार को जो देते हैं, किसी न किसी रूप में वही हमारे पास लौटकर आता है। यदि हमारे शब्दों में प्रेम, व्यवहार में सम्मान और कर्मों में अच्छाई होगी, तो जीवन भी हमें उसी का प्रतिफल देगा। इसलिए दुनिया को बेहतर बनाने की शुरुआत दूसरों से नहीं, स्वयं से करनी चाहिए।
मनुष्य जीवनभर छाया, काया और माया के पीछे भागता रहता है। लेकिन समय के साथ छाया अंधकार में खो जाती है, काया वृद्धावस्था में कमजोर पड़ जाती है और माया मृत्यु के बाद यहीं रह जाती है। अंततः हमारे साथ यदि कुछ जाता है तो वह है हमारे कर्म, हमारा व्यवहार और लोगों के दिलों में छोड़ी गई हमारी पहचान।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
जीवन में हर परिस्थिति अपने साथ कोई न कोई सीख लेकर आती है। बुरा समय हमें अच्छे समय की कीमत समझाता है और बदलते लोग हमें रिश्तों की वास्तविकता पहचानना सिखाते हैं। इसलिए परिस्थितियों से घबराने के बजाय उनसे सीखना चाहिए। सही दिशा में किया गया एक छोटा-सा शुभ कर्म भी वर्तमान को संवारने के साथ भविष्य को बदलने की क्षमता रखता है।
हमारी पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि हम क्या कहते हैं, बल्कि इससे बनती है कि हम क्या करते हैं। इसलिए बात ऐसी करें जो दूसरों के मन को ठेस न पहुंचाए, कर्म ऐसे करें जिन्हें ईश्वर के सामने रखने में संकोच न हो और मित्र ऐसे बनाएं जो सुख में भले दूर रहें, लेकिन दुख में सीने से लगकर खड़े हों। जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि हमारे जाने के बाद भी लोग हमें सम्मान और स्नेह से याद करें।
किसी व्यक्ति का आपके सामने अपनी समस्या रखना केवल बातचीत नहीं, बल्कि विश्वास का संकेत है। जब कोई अपना दुख आपके साथ साझा करता है तो वह आप पर भरोसा करता है। कोशिश होनी चाहिए कि उसका यह विश्वास कभी न टूटे। रिश्तों की खूबसूरती पूर्णता में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करने में है। यदि हम हर रिश्ते में पूर्णता तलाशेंगे, तो अंततः रिश्ते कम और अकेलापन अधिक मिल सकता है।
सुखी जीवन का सरल सूत्र है—कर्म श्रेष्ठ रखें और परिणाम को सहजता से स्वीकार करें। अवसर मिले तो किसी के जीवन का सारथी बनें, स्वार्थी नहीं। किसी की राह आसान बनाना, किसी के दुख में साथ देना और किसी को गिरने के बाद उठने का साहस देना ही मानवता का वास्तविक अर्थ है।
हार जीवन का अंत नहीं है। कई बार हार के बाद शुरू होने वाली तैयारी ही सफलता की सबसे मजबूत नींव बनती है। इसलिए हर प्रयास को महत्वपूर्ण समझना चाहिए। अनुशासन शुरुआत में कठिन जरूर लगता है, लेकिन जब वही हमारी आदत बन जाता है तो सफलता की राह आसान होने लगती है।
जीवन वास्तव में वही लौटाता है, जो हम उसे देते हैं। इसलिए नकारात्मकता के बदले सकारात्मकता, घृणा के बदले प्रेम, शिकायत के बदले समाधान और स्वार्थ के बदले सेवा को चुनें। क्योंकि जीवन की प्रतिध्वनि देर से सही, लेकिन लौटकर जरूर आती है। प्रश्न केवल इतना है कि जब वह लौटे, तो हम उसमें अपने कर्मों की कैसी आवाज सुनना चाहते हैं।







