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जीवन में आकांक्षाएँ ही ईश्वरीय प्रेरणास्रोत: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: जिन आकांक्षाओं का कोई उद्देश्य नहीं,कोई उपयोग नहीं अथवा जिनके पीछे कोई हितकर प्रेरणा मौजूद न हो,वे मृग-मरीचिका के सिवाय और क्या कही जाएंगी ?

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।निश्चित ही जब-जब मनुष्य की आकांक्षाएँ नशे का रूप धारण कर लेती हैं,तब वे उसे उस नशेबाज की तरह बना देती हैं,जो अपने मद में अंधा होकर नाली में गिरता रहता है,किन्तु अपना सुधार नहीं करता।वास्तविक आकांक्षाएँ तो वही कही जाएँगी,जिनके पीछे कुछ उद्देश्य, हित,आदर्श,आवश्यकता अथवा उपयोगिता की प्रेरणा मौजूद हो। यों ही किसी लोभ,लालच अथवा स्वार्थ से प्रेरित होकर ऊटपटांग इच्छाओं को पाल लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है।यह तो उस कबाड़ी जैसा काम है,जो अपने घर में जगह-जगह से उठा कर तमाम निरर्थक और निरूपयोगी वस्तुओं का ढेर लगा लिया करता है। आकांक्षाएँ जीवन की प्रेरणास्रोत अवश्य हैं, किंतु उनको समझने, परखने के लिए विवेक की भी अपेक्षा है।अपने हृदय में पालने से पहले अपनी महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा कर लेना और समझ लेना परम आवश्यक है कि इनमें कोई यथार्थ तथा उपयोगी तत्व भी है अथवा केवल ये मायाजाल है,जो मनुष्य को सहज-सुंदर जीवन को भुलावे की राहों पर भटका देता है और मनुष्य अपनी सहज सुख-शांति,मानसिक व्यवस्था और बौद्धिक संतुलन खो बैठता है।

मनुष्य की जिन आकांक्षाओं के पीछे एकमात्र स्वार्थ-सिद्धि की प्रेरणा होती है,वे निकृष्टतम स्तर की ही होती हैं और निकृष्टता, किसी श्रेयता एवं श्रेष्ठता का संपादन कर सकेगी,यह सर्वथा असंभव ही है। आकांक्षाएँ वस्तुतः मनुष्य जीवन की प्रेरणा-स्रोत हैं। आकांक्षाओं के अभाव में जीवन की गतिशीलता समाप्त हो जाती है।हम अपनी आकांक्षाओं की परीक्षा करें,उन्हें सत्य एवं यथार्थ की कसौटी पर परखें तथा हित-अहित की तुला पर उनका मूल्यांकन करें।इसी में जीवन जीने का यथार्थ व समझदारी है।