नेशनल डेस्क , स्वेता प्रिया
वैश्विक स्तर पर बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें, कमजोर निजी निवेश और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर में इस वित्त वर्ष कुछ कमी आने की संभावना जताई गई है। एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इस वर्ष धीमी रह सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए रखेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 7.7 प्रतिशत रही थी, जबकि वित्त वर्ष 2026-27 में इसके घटकर करीब 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाल रही हैं। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन, बिजली उत्पादन, उद्योगों और कृषि क्षेत्र की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ने लगते हैं, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। महंगाई बढ़ने से आम लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होती है और कंपनियों के लिए उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है, जिससे नए निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कई देशों में ऊंची ब्याज दरें, धीमा वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक तनाव आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं। इन परिस्थितियों का असर भारत के निर्यात, विदेशी निवेश और औद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ सकता है। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका प्रभाव आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर और अधिक दिखाई दे सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे पर लगातार बढ़ाया जा रहा निवेश, विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देने वाली योजनाएं, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और घरेलू मांग की मजबूती भारत की आर्थिक वृद्धि को सहारा दे सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में कमी आती है और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में सुधार होता है, तो अगले वित्त वर्ष में भारत की विकास दर फिर से तेज होने की उम्मीद है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियाद पर खड़ी है। सही नीतियों, निवेश और वैश्विक परिस्थितियों में सुधार के साथ देश आने वाले वर्षों में फिर से तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकता है।







