स्पोर्ट्स डेस्क, शिवेश कुमार शौर्य।
- महज दो साल की उम्र में पोलियो, पहली शादी में प्रताड़ना, ट्रेनिंग के लिए 2023 में घर तक बेचना पड़ा... अब ग्लास्गो में 9.81 मीटर का गोल्डन थ्रो फेंककर भारत को दिलाया ऐतिहासिक स्वर्ण पदक।
नई दिल्ली: कभी पोलियो ने कदम रोक दिए, कभी गरीबी ने सपनों पर पहरा बिठाया। दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और आर्थिक तंगी जैसी मुश्किलों ने भी उनका रास्ता नहीं बदला। आखिरकार वर्षों के संघर्ष का इनाम उन्हें ग्लास्गो में मिला, जहां कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की पैरा शॉटपुट खिलाड़ी शर्मिला धनखड़ ने महिला शॉटपुट F57 वर्ग में 9.81 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो फेंककर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। उनके इस शानदार प्रदर्शन के सामने कोई भी प्रतिद्वंद्वी नहीं टिक सका। इस जीत के साथ भारत के खाते में छठा पदक जुड़ा और पैरा एथलेटिक्स में कॉमनवेल्थ गेम्स के 20 साल पुराने इंतजार का भी अंत हो गया। शर्मिला इस स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली पैरा एथलीट बन गईं।
2 साल की उम्र में पोलियो, बचपन से शुरू हो गया संघर्ष
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव की रहने वाली शर्मिला धनखड़ की जिंदगी बचपन से ही कठिनाइयों से भरी रही। महज दो साल की उम्र में पोलियो ने उनके एक पैर को प्रभावित कर दिया। किसान पिता सीमित संसाधनों के कारण उनका बेहतर इलाज नहीं करा सके, जबकि उनकी मां भी दृष्टिबाधित हैं। आर्थिक तंगी के बीच उनका बचपन बीता और कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई।
दहेज प्रताड़ना झेली, दो बेटियों के साथ लौटना पड़ा मायके
शादी के बाद भी उनकी परेशानियां खत्म नहीं हुईं। कई वर्षों तक उन्हें दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। 26 साल की उम्र में उनके पहले पति ने उन्हें घर से निकाल दिया। उस समय उनकी दो बेटियां थीं। मजबूरी में शर्मिला बच्चों के साथ अपने पिता के घर लौट आईं, लेकिन उन्होंने हालात के सामने हार मानने से इनकार कर दिया।
दूसरी शादी ने बदली जिंदगी, पति ने दिखाया नया रास्ता
28 साल की उम्र में शर्मिला ने अजीत से दूसरी शादी की। उनके दूसरे पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया। अखबार में पैरा एथलीट्स के बारे में पढ़ने के बाद अजीत ने ही शर्मिला को इस खेल में किस्मत आजमाने की सलाह दी। यही फैसला आगे चलकर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
34 साल की उम्र में शुरू की ट्रेनिंग, सपना पूरा करने के लिए बेच दिया घर
पति के सहयोग के बावजूद खेल का सफर आसान नहीं था। शर्मिला ने 34 साल की उम्र में कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में शॉटपुट की ट्रेनिंग शुरू की और F57 वर्ग की व्हीलचेयर (सीटेड थ्रो) स्पर्धा को चुना। आर्थिक तंगी इतनी गहरी थी कि ट्रेनिंग का खर्च जुटाने के लिए वर्ष 2023 में उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा और परिवार किराये के मकान में रहने लगा। इसके बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कदम पीछे नहीं खींचे।
बर्मिंघम में मिली निराशा, फिर जीत लिया दुनिया का दिल
बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में शर्मिला पदक से चूक गई थीं और चौथे स्थान पर रही थीं। हालांकि, इस हार ने उनके इरादों को और मजबूत कर दिया। इसके बाद उन्होंने 2023 एशियन पैरा गेम्स में दमदार प्रदर्शन किया। दुबई फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक भी अपने नाम किया। इससे पहले 2021 की नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई थी।
ग्लास्गो में गोल्डन थ्रो, संघर्ष को मिला सुनहरा अंजाम
ग्लास्गो के मैदान पर 9.81 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो सिर्फ एक जीत नहीं था, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग और अटूट हौसले की कहानी का सुनहरा अंत था। पोलियो, गरीबी, दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और संसाधनों की कमी जैसी तमाम चुनौतियों से लड़ने के बाद शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में इतिहास रच दिया और भारत को पैरा एथलेटिक्स का यादगार स्वर्ण पदक दिला दिया।







